अथ श्री कलेण्डर कथा
नव वर्ष को बीते आज
12 दिन हो रहे है और जैसा की एक कहावत है की नया 9 दिन और पुराना सौ दिन | मतलब नए
साल को ख़तम हुए आज तीसरा दिन हो रहा है और पुराने की शुरुआत हुए तीन दिन हो गए है
| लेकिन कोई फायदा नहीं, भैया | आज 12 दिन बाद भी बन्दे के पास नए साल का कलेंडर
नहीं है | कलेंडर के लिए इस ना चीज ने क्या क्या जुगत नहीं लगाया लेकिन सब बेकार |
अभी अभी महीने का राशन जनरल
स्टोर से आ गया है | हमारी धर्मपत्नी हिसाब मिलाने बैठी की लिस्ट से कोई सामान छुट
तो नहीं गया | उन्होंने मेरी तरफ देखा, शायद थोडा नाराज होकर बोली {अब आप को तो
पता ही होगा की घरवाली की थोड़ी नाराज़गी कितनी ज्यादा होती है} “ये क्या सामान के
थैले में खोज रहे हो, एक आदमी बीवी की मदद करता है, और एक तुम हो की सारा सामान इधर
उधर कर दिया, हटो, हाथ मत लगाओ, उम्र होती जा रही है कब सुधरोगे” अरे यार नाराज़ क्यू
होती हो, और उम्र का क्या, अभी तो सिर्फ 32 का ही तो हूँ | अच्छा इस उम्र मेंरे
पापा ने 3 BHK बना लिया था, मेरे भैया ने दो दो ट्रक खरीद लिए थे और मेरे जीजा
| बस बस, मै
समझ गया, मै समझ गया | माफ़ कराना भाई | इतना कह कर मै बाहर जाने लगा तो
उन्होंने फिर टोका – जा कहाँ रहे हों, चलो सामान मिलाओ | अब आप तो जानते है की
पत्नी का आदेश तो बड़े बड़े पहलवान नहीं टाल सके, तो मेरी क्या औकात | खैर समान
मिलवाने के बाद शाम को धर्म पत्नी ने पैसे दिए और कहा की मै उसे राशन वाले को दे
आऊ {पत्नी ने पैसे दिए का मतलब ये नहीं है की भैया मै नौकरी नहीं करता, नौकरी तो मै
ही करता हूँ, लेकिन हिसाब घरवाली ही रखती है, समझे} हाँ तो भैया हम नए कलेंडर के
लिए छटपटाते हुए पहुच गए और तुरंत पूछ लिया और वर्मा जी क्या चल रहा है, तो वर्मा
जी अपना काम छोड़ हँसते हुए बोले भैया आज कल तो फाग चल रहा है | मै सोच में पड़ गया
की यार मेरे मोहल्ले में तो अभी तक ढंग से सर्दी नहीं पड़ रही, और इनकी दुकान में फाग
चल रहा है | मै सोच ही रहा था की वर्मा जी की जोर से भयानक वाली हंसी सुन कर मुझे
याद आया की मै यहाँ क्यू आया हूँ | मैंने कहा हाँ वो तो ठीक है, लेकिन और क्या चल रहा
है | इतना सुनना था की वो और भयंकर हँसे | अरे दुबे जी फाग का विज्ञापन चल रहा है
| वर्मा जी को हँसते देख मन हुआ दूँ कान के नीचे एक, लेकिन डर लगा की कही कलेंडर के
लिए माना ना कर दे | खैर मै अपने ट्रैक पर आया, वर्मा जी नया साल मुबारक, अरे
दुबे जी कितनी बार मुबारकबाद दोगें यार एक बार हो गया, दो बार हो गया, ती....
अच्छा भाई ठीक है, मै उनके तीन बार बोलने से पहले ही तपाक से बोला | मै कुछ बोलता
की वर्मा जी बोले अरे छोटू दुबे जी का बिल तो ला | मैंने कहा यार वर्मा बिल तो
तुम्हे याद है | लेकिन नए साल पर और कुछ याद नहीं रहता | अब वर्मा जी सोचने लगे और
बोले भैया तुम पीते तो नहीं हो, इसी लिए 31 दिसम्बर की शाम को नहीं बुलाया, लेकिन आज उस दिन
की कमी पूरी कर दूंगा | मै सकपकाया अरे क्या बोतल थमा दोगे, अरे नही, तुम्हारी
भाभी ने पेडे बनाये है, लो खाओ, वर्मा जी ने बोलने के साथ ही मेरे मुहं में दो पेडे
ठूस दिए और हसने लगें | हे हे हे | हो गया, अरे वर्मा हँसना तो सीख लो भाई और मै पेडे की
बात नहीं कर रहा हूँ समझे | तो क्या, अब पेडे से बढकर क्या है, नमकीन खाओगे, चाय
माँगाऊ | वर्मा जी कुछ और बोलते इससे पहले मै बोला कलेंडर | वर्मा जी के मुह से निकला क्या कलेंडर | हाँ कलेंडर, निकालो एक भी नहीं दिया वर्मा जी हम आपके परमानेंट कस्टमर है, कुछ ख्याल करों | अरे
क्या ख्याल करूँ दुबे जी आप तो जानते ही है की कलेंडर' के चक्कर में पिछले साल मेरी
खटिया खड़ी हो गई थी | अरे तो क्या इस साल
किसी कम्पनी ने भी नहीं दिया, कोई कलेंडर
का ऑफर तो रहा ही होगा | मैंने अपना तीर छोड़ा, लेकिन हाय री किस्मत मिस हो गया |
भाई दुबेजी एक कच्छा बनियान वाली कम्पनी
ने 500 डब्बे खरीदने पर दो कलेंडर का ऑफर दिया था | ये हुई ना बात, तो निकालो मेरा वाला, क्या आपका कच्छा बनियान हे हे हे, वर्मा जी ने अपना बेहूदा मजाक किया | मेरे बोलते ही उनका प्रतिउत्तर था | अरे कैसी बात करते हो
भाई मै कलेंडर की बात कर रहा हूँ | अरे कहाँ दुबे जी मैंने तो मंगवाया ही नहीं,
अभी पुराना ही नहीं ख़तम हुआ है और तुम तो जानते हो की आज कल लड़के लडकियां नए माडल
और नए फैसन की चड्डी बनियान लेते है और हाँ आज कल तो महगाई इतनी बढ़ गई है की
हम जैसे मिडल क्लास वाले तो पहनते ही नहीं है हे हे हे | वर्मा जी ने दांत दिखाते
हुए ज्ञान दिया | मन हुआ ज्ञान के बदले दू कान के नीचे, लेकिन मन को काबू में रखते
हुए मैंने उनका हिसाब किया | दुकान से बाहर निकला और मिठाई की दुकान पर पंहुचा |
भाव ताव किया, लेना तो कुछ था नहीं इसलिए सीधे सीधे नए साल के कलेंडर की बात पूछ डाली, दुकानदार ने मझे ऐसा देखा जैसे मैंने उधार मांग लिया हो और फिर नतीजा शून्य | छटपटाहट
बढती जा रही थी | मै सब्जी वाले से लेकर पान वाले तक सब पूछ डाला | हद तो तब हो गई
जब मै अंग्रेजी शराब की दुकान पर भी पहुँच
गया | सामने लिखा था महाठंढी बियर | ठंडी तो सुना था ये महा ठंढी क्या है, खैर वहां
भी निराशा मिली | थक हार कर घर पहुंचा, खाना खाया और टीवी देख रहा था, की दिमाग में लाइट
जली अरे निराश क्यू होते हो | भाई कल स्टेशनरी वाले के यहाँ धावा | पार्टी वालों
के यहाँ धावा | दलालों के यहाँ धावा, कल तो बीमा की क़िस्त भी जमा करनी है तो हो सकता
है की वही कल्याण कर दे, एक कलेंडर दे दे |
सुबह आफिस जाने की
कुछ ज्यादा जल्दी थी | लेकीन ट्राफिक में फसते हुए भी 9.30 बजे पहुच ही गए | आफिस में घुसते
ही चपरासी को 20 का नोट दिया और हिदायत दी की किसी भी पेपर में कोई भी कलेंडर आये
तो सीधे मेरी स्कूटर की डीग्गी के हवाले कर दे | आफिस में सब आ रहे थे, जा रहे थे
| लेकिन वो नहीं आ रहे थे जिनका मुझे इन्तजार था | मैंने कई बार घडी देखी, लेकिन कोई नहीं आ रहा है | तंग आ कर मैंने अपने वरिष्ठ
लेखाधिकारी श्री खान साहब से पूछ ही लिया ”सर ये स्टेशनरी वाला कब आएगा, पार्टी वाले भी नहीं आ रहे है,
ब्रोकर भी नहीं आ रहे है, कोई भी आफिस नहीं आ रहा है, मुझे तो बीमा की क़िस्त भी जमा करनी है | लेकिन
कमबख्त एजेंट नहीं आ रहा है” | अरे दुबेजी आप भी ना, आप को पता नहीं क्या स्टेशनरी
का सामान आ गया है अरे वो एजेंसी वाले ने लड़के के हाथों भिजवा दिया है और ये
ब्रोकर, पार्टी वाले सब आज कल फोन पर ही बात कर लेते है और ये बीमा एजेंट तब तक
नहीं आएगा, जब तक आप की अगली क़िस्त की तारीख नहीं आ जायेगी | अच्छा होगा, आप अपनी क़िस्त स्वम
ही जमा करा आइये आप नेट बैंकिंग क्यू नहीं इस्तेमाल करते \ वरिष्ठ लेखाधिकारी ने
ज्ञान के साथ सुझाव दिया | क्यू सर ऐसा क्यू, मैंने प्रश्नवाचक मुद्रा बनाई | अरे
नया साल आ गया है अरे सभी जानने वाले पहचानने
वाले कलेंडर पूरी जनवरी मांगते रहते है अरे मिया कुछ तो बेशर्मी की हद पार
कर जाते है फ़रवरी में भी कलेंडर मांगते है | और आप तो जानते है की महगाई में कास्ट कटिंग के चक्कर में कलेंडर कोई
नहीं छपवा रहा है, और हम लोग आम आदमी है इस महगाई में कलेंडर ख़रीदे की कोई और काम
करे, अरे मिया इस महगाई में तो मै....., चड्डी बनियान भी नहीं पहन पा रहा है |
मैंने उनकी बात बीच में काटी | ला होल विला कुवत क्या बात करते है मेरे पास दो
जोड़ी नई रखी है | मैंने कहा बुरा मत मानिये खान साहब याद करिये, ये क्या हो गया \
मुझे अपनी घर की सुनी दीवारे दिखाई देने लगी \ कभी उन दीवारों पर त्वचा को नरम
बनाने वाले साबुन का विज्ञापन करती हसीन अभिनेत्री का चेहरा आँखों के सामने आ
जाता, तो कभी बालो को घाना और घुंघराला बनाने के लिए आवंले का तेल लगाती पूनम
डिल्लो का कलेंडर, और वो मर्फी का कलेंडर याद है आप को जिसमे एक गर्भवती महिला
जच्चा बच्चा की देखभाल करती दिखाई देती थी, बचपन
में हम सब उसे बबुआ कलेंडर कहते थे और अगर कोई घर की महिला गर्भवती वो तो भगवन श्री कृष्ण के कलेंडर के बगल में उसे जरुर लटका देते थे | ताकी महिला को इस बात का ध्यान रहे की उसे अपनी देख भाल भी करनी है और तभी बच्चा कृष्ण भगवन की तरह सुंदर और स्वस्थ होगा | मेरे दादा जी को बड़े नम्बरों वाला कलेंडर पसंद आता था | वो शाम को सोते हुए महीने के उस दिन के डब्बे को पेन से काट देतें थे, और जब मै पूछता की दादा जी ये क्यू काटा, तो कहते दिन काट रहा हूँ, तो मुझे लगता वे अध्यात्मिक हो गए है, कलेंडर का इतना फायदा था, सीधे साधे आदमी को फिलासफर बना देता था | मैंने खान साहब से कहा | बात तो सही कहते हो भाई जान अपने लेखा विभाग में भी एक बड़े नंबरों वाला कलेंडर की जरुरत है | वरिष्ठ लेखाधिकारी ने जरूरत के हिसाब से मुझे अवगत करवाया | अचानक उन्होंने कहाँ दुबेजी आप जानते है | आज कल क्या हो रहा है | वैसे मै जनता था, लेकिन अनजान बनते हुए कहा "नहीं क्या हुआ" | अरे हुआ, क्या बड़े साहब और वरिष्ठ विपणन अधिकारी जी घंटों बंद केबिन में या फिर एकांत में गुफ्तगू करते रहते है | हमने कई बार वरिष्ठ विपणन अधिकारी से पूंछा, लेकिन उन्होंने बात टाल दी | तभी हमारे वरिष्ठ विपणन अधिकारी महोद्य आ गए, तो आदत के मुताबिक खान साहब ने पूछ ही लिया और साहब क्या चल रहा | मुझे तो डर था कही साहब ये ना कह दे की खान साहब फाग चल रहा है लेकिन साहब ने बात बदली खान साहब ये सब छोडिये और ये बताइए की वो रिपोर्ट तैयार हो गई | लेकिन हम सब उनके पीछे पड़ गए तो तंग आ कर उन्होंने मुह खोला आप सब तो जानते है, की इस वर्ष कही भी कलेंडर नहीं मिल रहा है और हर जगह बड़ी बेज्जती हो रही है की कैसा दफ़्तर है एक कलेंडर भी इनके यहाँ नहीं है, तो बड़े साहब ने तय किया है की हम लोग अपने जेब से कलेंडर छापवायेगें | क्या जेब से, मै बोला | अरे भाई दिखाने के लिए, वेतन से अनुदान कर देंगे | हम सभी पार्टी और ब्रोकर से सुविधा शुल्क बढ़ा देंगे | हम सभी को उनकी बात जाँच गई, और सभी ने वेतन से अनुदान किया, साथ ही साईंड से सुविधा शुल्क बढ़ा दिया गया, सभी खुश | खैर संस्था के लोगो से चमकता हुआ, किसान विकास को समर्पित गंगा किसान का कलेंडर छप गया | चपरासी को सक्त हिदायत के साथ कलेंडरो की डिलेवरी के लिए भेजा की एक भी कलेंडर इधर से उधर नहीं होना चाहिए, क्यू की हमारे चपरासी के कई रिश्तेदार भी रास्ते में है तो हमें डर था, की कही भैया जी सेखी में बांटते हुए ना आ जाये | लेकिन कम्खत 10 कलेंडर गायब कर के ही माना |
में हम सब उसे बबुआ कलेंडर कहते थे और अगर कोई घर की महिला गर्भवती वो तो भगवन श्री कृष्ण के कलेंडर के बगल में उसे जरुर लटका देते थे | ताकी महिला को इस बात का ध्यान रहे की उसे अपनी देख भाल भी करनी है और तभी बच्चा कृष्ण भगवन की तरह सुंदर और स्वस्थ होगा | मेरे दादा जी को बड़े नम्बरों वाला कलेंडर पसंद आता था | वो शाम को सोते हुए महीने के उस दिन के डब्बे को पेन से काट देतें थे, और जब मै पूछता की दादा जी ये क्यू काटा, तो कहते दिन काट रहा हूँ, तो मुझे लगता वे अध्यात्मिक हो गए है, कलेंडर का इतना फायदा था, सीधे साधे आदमी को फिलासफर बना देता था | मैंने खान साहब से कहा | बात तो सही कहते हो भाई जान अपने लेखा विभाग में भी एक बड़े नंबरों वाला कलेंडर की जरुरत है | वरिष्ठ लेखाधिकारी ने जरूरत के हिसाब से मुझे अवगत करवाया | अचानक उन्होंने कहाँ दुबेजी आप जानते है | आज कल क्या हो रहा है | वैसे मै जनता था, लेकिन अनजान बनते हुए कहा "नहीं क्या हुआ" | अरे हुआ, क्या बड़े साहब और वरिष्ठ विपणन अधिकारी जी घंटों बंद केबिन में या फिर एकांत में गुफ्तगू करते रहते है | हमने कई बार वरिष्ठ विपणन अधिकारी से पूंछा, लेकिन उन्होंने बात टाल दी | तभी हमारे वरिष्ठ विपणन अधिकारी महोद्य आ गए, तो आदत के मुताबिक खान साहब ने पूछ ही लिया और साहब क्या चल रहा | मुझे तो डर था कही साहब ये ना कह दे की खान साहब फाग चल रहा है लेकिन साहब ने बात बदली खान साहब ये सब छोडिये और ये बताइए की वो रिपोर्ट तैयार हो गई | लेकिन हम सब उनके पीछे पड़ गए तो तंग आ कर उन्होंने मुह खोला आप सब तो जानते है, की इस वर्ष कही भी कलेंडर नहीं मिल रहा है और हर जगह बड़ी बेज्जती हो रही है की कैसा दफ़्तर है एक कलेंडर भी इनके यहाँ नहीं है, तो बड़े साहब ने तय किया है की हम लोग अपने जेब से कलेंडर छापवायेगें | क्या जेब से, मै बोला | अरे भाई दिखाने के लिए, वेतन से अनुदान कर देंगे | हम सभी पार्टी और ब्रोकर से सुविधा शुल्क बढ़ा देंगे | हम सभी को उनकी बात जाँच गई, और सभी ने वेतन से अनुदान किया, साथ ही साईंड से सुविधा शुल्क बढ़ा दिया गया, सभी खुश | खैर संस्था के लोगो से चमकता हुआ, किसान विकास को समर्पित गंगा किसान का कलेंडर छप गया | चपरासी को सक्त हिदायत के साथ कलेंडरो की डिलेवरी के लिए भेजा की एक भी कलेंडर इधर से उधर नहीं होना चाहिए, क्यू की हमारे चपरासी के कई रिश्तेदार भी रास्ते में है तो हमें डर था, की कही भैया जी सेखी में बांटते हुए ना आ जाये | लेकिन कम्खत 10 कलेंडर गायब कर के ही माना |
अगले दिन दफ्तर का
हर कर्मचारी समय के पहले ही पहुँच गया | मुझे ऐसा लगा की जैसे एरियर का चेक मिलने वाला है | खैर सुबह आते ही मैंने
एक कलेंडर हथिया लिया और बगल के मिश्रा जी के लड़के को बुला कर कहा की ये कलेंडर
मेरे घर पंहुचा दे तो मिश्रा जी की राजदुलारे ने तुरंत सर्विस चार्ज के रूप में 20
रुपये मांग लिए | मै बोला अरे बेटा वो किस लिए, तो छूटके ने हमें ज्ञान दिया की
दफ्तर से आफिस कम से कम ½ कि०मी० की दुरी पर है | ऐसे में कलेंडर को बचाते हुए पहुचना
बड़ी मुस्किल काम है | पता नहीं किस की नियत ख़राब हो जाये | अच्छा अच्छा ये लो बीस रुपये, आज कल के लड़के ना बस, शिष्टाचार तो है ही नहीं, अरे हमारे ज़माने में तो आँख बंद करके
बड़ो की आज्ञा का पालन करते थे | तो छुटकू बोला मै भी आँख बंद कर के आज्ञा मान सकता
हूँ, लेकिन कलेंडर घर पहुचे गा ,की नहीं, ये नहीं कह सकता | मैंने बहस बढ़ाने की बजाय
20 /- देना ज्यादा मुनासिब समझा | खैर थोड़ी देर में ही हम दफ्तर में बैठ कर कलेंडर देख रहे थे | वाकई कलेंडर बहुत ही खुबसूरत छपा था, की बाहर से आवाज आई, अरे गुप्ता जी है {अरे गुप्ता जि मतलब हमारे बड़े साहब, जिनकी कृपा से और सुझाव से ये कलेंडर छपा} | तभी चपरासी दौड़ते हुए
आया और बोला आफिस के बाहर भीड़ लगी है | पार्टी वाले, ब्रोकर , और क्यू की हमारा
दफ्तर रेसीडेंसी में था, तो मोहल्ले वाले भी इक्कट्ठा हो गए थे | बड़े साहब ने पूछा
ये भीड़ क्यू हो रही है, तो चपरासी बोला साहब सब लोग कलेंडर खातिर जमा हुए है | ये
सुनना था की मै और खान साहब अपना सर पकड़ कर बैठ गए और बड़े साहब के साथ वरिष्ठ
विपणन अधिकारी जी केबिन में गुप्त मंत्रणा करने लगे | अरे यार इस लिए नहीं की कोई खेला करना है, बल्कि इस लिए की, छपे हुए कलेंडर को कैसे बचाना है |
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