Tuesday, 12 January 2016

अथ श्री कलेण्डर कथा

अथ श्री कलेण्डर कथा

नव वर्ष को बीते आज 12 दिन हो रहे है और जैसा की एक कहावत है की नया 9 दिन और पुराना सौ दिन | मतलब नए साल को ख़तम हुए आज तीसरा दिन हो रहा है और पुराने की शुरुआत हुए तीन दिन हो गए है | लेकिन कोई फायदा नहीं, भैया | आज 12 दिन बाद भी बन्दे के पास नए साल का कलेंडर नहीं है | कलेंडर के लिए इस ना चीज ने क्या क्या जुगत नहीं लगाया लेकिन सब बेकार |
अभी अभी महीने का राशन जनरल स्टोर से आ गया है | हमारी धर्मपत्नी हिसाब मिलाने बैठी की लिस्ट से कोई सामान छुट तो नहीं गया | उन्होंने मेरी तरफ देखा, शायद थोडा नाराज होकर बोली {अब आप को तो पता ही होगा की घरवाली की थोड़ी नाराज़गी कितनी ज्यादा होती है} “ये क्या सामान के थैले में खोज रहे हो, एक आदमी बीवी की मदद करता है, और एक तुम हो की सारा सामान इधर उधर कर दिया, हटो, हाथ मत लगाओ, उम्र होती जा रही है कब सुधरोगे” अरे यार नाराज़ क्यू होती हो, और उम्र का क्या,  अभी तो सिर्फ 32 का ही तो हूँ | अच्छा इस उम्र मेंरे पापा ने 3 BHK बना लिया था, मेरे भैया ने दो दो ट्रक खरीद लिए थे और मेरे जीजा | बस बस,  मै  समझ गया, मै समझ गया | माफ़ कराना भाई | इतना कह कर मै बाहर जाने लगा तो उन्होंने फिर टोका – जा कहाँ रहे हों, चलो सामान मिलाओ | अब आप तो जानते है की पत्नी का आदेश तो बड़े बड़े पहलवान नहीं टाल सके, तो मेरी क्या औकात | खैर समान मिलवाने के बाद शाम को धर्म पत्नी ने पैसे दिए और कहा की मै उसे राशन वाले को दे आऊ {पत्नी ने पैसे दिए का मतलब ये नहीं है की भैया मै नौकरी नहीं करता, नौकरी तो मै ही करता हूँ, लेकिन हिसाब घरवाली ही रखती है, समझे} हाँ तो भैया हम नए कलेंडर के लिए छटपटाते हुए पहुच गए और तुरंत पूछ लिया और वर्मा जी क्या चल रहा है, तो वर्मा जी अपना काम छोड़ हँसते हुए बोले भैया आज कल तो फाग चल रहा है | मै सोच में पड़ गया की यार मेरे मोहल्ले में तो अभी तक ढंग से सर्दी नहीं पड़ रही, और  इनकी दुकान में फाग चल रहा है | मै सोच ही रहा था की वर्मा जी की जोर से भयानक वाली हंसी सुन कर मुझे याद आया की मै यहाँ क्यू आया हूँ | मैंने कहा हाँ वो तो ठीक है,  लेकिन और क्या चल रहा है | इतना सुनना था की वो और भयंकर हँसे | अरे दुबे जी फाग का विज्ञापन चल रहा है | वर्मा जी को हँसते देख मन हुआ दूँ कान के नीचे एक, लेकिन डर लगा की कही कलेंडर के लिए माना ना कर दे | खैर मै अपने ट्रैक पर आया, वर्मा जी नया साल मुबारक, अरे दुबे जी कितनी बार मुबारकबाद दोगें यार एक बार हो गया, दो बार हो गया, ती.... अच्छा भाई ठीक है,  मै उनके तीन बार बोलने से पहले ही तपाक से बोला | मै कुछ बोलता की वर्मा जी बोले अरे छोटू दुबे जी का बिल तो ला | मैंने कहा यार वर्मा बिल तो तुम्हे याद है | लेकिन नए साल पर और कुछ याद नहीं रहता | अब वर्मा जी सोचने लगे और बोले भैया तुम पीते तो नहीं हो,  इसी लिए 31 दिसम्बर की शाम को नहीं बुलाया,  लेकिन आज उस दिन की कमी पूरी कर दूंगा | मै सकपकाया अरे क्या बोतल थमा दोगे, अरे नही,  तुम्हारी भाभी ने पेडे बनाये है, लो खाओ, वर्मा जी ने बोलने के साथ ही मेरे मुहं में दो पेडे ठूस दिए और हसने लगें | हे हे हे | हो गया,  अरे वर्मा हँसना तो सीख लो भाई और मै पेडे की बात नहीं कर रहा हूँ समझे | तो क्या,  अब पेडे से बढकर क्या है, नमकीन खाओगे, चाय माँगाऊ | वर्मा जी कुछ और बोलते इससे पहले मै बोला कलेंडर | वर्मा जी के मुह से निकला क्या कलेंडर | हाँ कलेंडर, निकालो एक भी नहीं दिया वर्मा जी हम आपके परमानेंट कस्टमर है, कुछ ख्याल करों | अरे क्या ख्याल करूँ दुबे जी आप तो जानते ही है की कलेंडर' के चक्कर में पिछले साल मेरी खटिया खड़ी हो गई थी | अरे तो क्या इस  साल किसी कम्पनी ने भी नहीं  दिया, कोई कलेंडर का ऑफर तो रहा ही होगा | मैंने अपना तीर छोड़ा, लेकिन हाय री किस्मत मिस हो गया | भाई दुबेजी एक कच्छा बनियान  वाली कम्पनी ने 500 डब्बे खरीदने पर दो कलेंडर का ऑफर दिया था | ये हुई ना बात,  तो निकालो मेरा वाला, क्या आपका कच्छा बनियान हे हे हे, वर्मा जी ने अपना बेहूदा मजाक किया | मेरे बोलते ही उनका प्रतिउत्तर था | अरे कैसी बात करते हो भाई मै कलेंडर की बात कर रहा हूँ | अरे कहाँ दुबे जी मैंने तो मंगवाया ही नहीं, अभी पुराना ही नहीं ख़तम हुआ है और तुम तो जानते हो की आज कल लड़के लडकियां नए माडल और नए फैसन की चड्डी बनियान लेते है और हाँ आज कल तो महगाई इतनी बढ़ गई है की हम जैसे मिडल क्लास वाले तो पहनते ही नहीं है हे हे हे | वर्मा जी ने दांत दिखाते हुए ज्ञान दिया | मन हुआ ज्ञान के बदले दू कान के नीचे, लेकिन मन को काबू में रखते हुए मैंने उनका हिसाब किया | दुकान से बाहर निकला  और मिठाई की दुकान पर पंहुचा | भाव ताव किया, लेना तो कुछ था नहीं इसलिए सीधे सीधे नए साल के कलेंडर की बात पूछ डाली, दुकानदार ने मझे ऐसा देखा जैसे मैंने उधार मांग लिया हो और फिर नतीजा शून्य | छटपटाहट बढती जा रही थी | मै सब्जी वाले से लेकर पान वाले तक सब पूछ डाला | हद तो तब हो गई जब मै अंग्रेजी शराब की  दुकान पर भी पहुँच गया | सामने लिखा था महाठंढी बियर | ठंडी तो सुना था ये महा ठंढी क्या है, खैर वहां भी निराशा मिली | थक हार कर घर पहुंचा, खाना खाया और टीवी देख रहा था, की दिमाग में लाइट जली अरे निराश क्यू होते हो | भाई कल स्टेशनरी वाले के यहाँ धावा | पार्टी वालों के यहाँ धावा | दलालों के यहाँ धावा, कल तो बीमा की क़िस्त भी जमा करनी है तो हो सकता है की वही कल्याण कर दे, एक कलेंडर दे दे  |
सुबह आफिस जाने की कुछ ज्यादा जल्दी थी | लेकीन ट्राफिक में फसते हुए भी 9.30 बजे पहुच ही  गए | आफिस में घुसते ही चपरासी को 20 का नोट दिया और हिदायत दी  की किसी भी पेपर में कोई भी कलेंडर आये तो सीधे मेरी स्कूटर की डीग्गी के हवाले कर दे | आफिस में सब आ रहे थे, जा रहे थे | लेकिन वो नहीं आ रहे थे जिनका मुझे इन्तजार था | मैंने कई बार घडी देखी, लेकिन कोई नहीं आ रहा है | तंग आ कर मैंने अपने वरिष्ठ लेखाधिकारी श्री खान साहब से पूछ ही लिया ”सर ये स्टेशनरी वाला कब आएगा, पार्टी वाले भी नहीं आ रहे है, ब्रोकर भी नहीं आ रहे है,  कोई भी आफिस नहीं आ रहा है, मुझे तो बीमा की क़िस्त भी जमा करनी है | लेकिन कमबख्त एजेंट नहीं आ रहा है” | अरे दुबेजी आप भी ना, आप को पता नहीं क्या स्टेशनरी का सामान आ गया है अरे वो एजेंसी वाले ने लड़के के हाथों भिजवा दिया है और ये ब्रोकर, पार्टी वाले सब आज कल फोन पर ही बात कर लेते है और ये बीमा एजेंट तब तक नहीं आएगा, जब तक आप की अगली क़िस्त की तारीख नहीं आ जायेगी | अच्छा होगा, आप अपनी क़िस्त स्वम ही जमा करा आइये आप नेट बैंकिंग क्यू नहीं इस्तेमाल करते \ वरिष्ठ लेखाधिकारी ने ज्ञान के साथ सुझाव दिया | क्यू सर ऐसा क्यू, मैंने प्रश्नवाचक मुद्रा बनाई | अरे नया साल आ गया है अरे सभी जानने वाले पहचानने  वाले कलेंडर पूरी जनवरी मांगते रहते है अरे मिया कुछ तो बेशर्मी की हद पार कर जाते है फ़रवरी में भी कलेंडर मांगते है | और आप तो जानते है की  महगाई में कास्ट कटिंग के चक्कर में कलेंडर कोई नहीं छपवा रहा है, और हम लोग आम आदमी है इस महगाई में कलेंडर ख़रीदे की कोई और काम करे, अरे मिया इस महगाई में तो मै....., चड्डी बनियान भी नहीं पहन पा रहा है | मैंने उनकी बात बीच में काटी | ला होल विला कुवत क्या बात करते है मेरे पास दो जोड़ी नई रखी है | मैंने कहा बुरा मत मानिये खान साहब याद करिये, ये क्या हो गया \ मुझे अपनी घर की सुनी दीवारे दिखाई देने लगी \ कभी उन दीवारों पर त्वचा को नरम बनाने वाले साबुन का विज्ञापन करती हसीन अभिनेत्री का चेहरा आँखों के सामने आ जाता, तो कभी बालो को घाना और घुंघराला बनाने के लिए आवंले का तेल लगाती पूनम डिल्लो का कलेंडर, और वो मर्फी का कलेंडर याद है आप को जिसमे एक गर्भवती महिला जच्चा बच्चा की देखभाल करती दिखाई देती थी, बचपन
 में हम सब उसे बबुआ कलेंडर कहते थे और अगर कोई घर की महिला गर्भवती वो तो भगवन श्री कृष्ण के कलेंडर के बगल में उसे जरुर लटका देते थे | ताकी महिला को इस बात का ध्यान रहे की उसे अपनी देख भाल भी करनी है और तभी बच्चा कृष्ण भगवन की तरह सुंदर और स्वस्थ होगा | मेरे दादा जी को बड़े नम्बरों वाला कलेंडर पसंद आता था | वो शाम को सोते हुए महीने के उस दिन के डब्बे को पेन से काट देतें थे, और जब मै पूछता की दादा जी ये क्यू काटा, तो कहते दिन काट रहा हूँ, तो मुझे लगता वे अध्यात्मिक हो गए है, कलेंडर का इतना फायदा था, सीधे साधे आदमी को फिलासफर बना देता था | मैंने खान साहब से कहा | बात तो सही कहते हो भाई जान अपने लेखा विभाग में भी एक बड़े नंबरों वाला कलेंडर की जरुरत है | वरिष्ठ लेखाधिकारी ने जरूरत के हिसाब से मुझे अवगत करवाया  | अचानक उन्होंने कहाँ दुबेजी आप जानते है | आज कल क्या हो रहा है | वैसे मै जनता था, लेकिन अनजान बनते हुए कहा "नहीं क्या हुआ" | अरे हुआ, क्या बड़े साहब और वरिष्ठ विपणन अधिकारी जी घंटों बंद केबिन में या फिर एकांत में गुफ्तगू करते रहते है | हमने कई बार वरिष्ठ विपणन अधिकारी से पूंछा, लेकिन उन्होंने बात टाल दी | तभी हमारे वरिष्ठ विपणन अधिकारी महोद्य आ गए, तो आदत के मुताबिक खान साहब ने पूछ ही लिया और साहब क्या चल रहा | मुझे तो डर था कही साहब ये ना कह दे की खान साहब फाग चल रहा है लेकिन साहब ने बात बदली खान साहब ये सब छोडिये और ये बताइए की वो  रिपोर्ट तैयार हो गई | लेकिन हम सब उनके पीछे पड़ गए तो तंग आ कर उन्होंने मुह खोला आप सब तो जानते है, की इस वर्ष कही भी कलेंडर नहीं मिल रहा है और हर जगह बड़ी बेज्जती हो रही है की कैसा दफ़्तर है एक कलेंडर भी इनके यहाँ नहीं है, तो बड़े साहब ने तय किया है की हम लोग अपने जेब से कलेंडर छापवायेगें | क्या जेब से, मै बोला | अरे भाई दिखाने के लिए, वेतन से अनुदान कर देंगे | हम सभी  पार्टी और ब्रोकर से सुविधा शुल्क बढ़ा देंगे | हम सभी को उनकी बात जाँच गई, और सभी ने वेतन से अनुदान किया, साथ ही साईंड से सुविधा शुल्क बढ़ा दिया गया, सभी खुश | खैर संस्था के लोगो से चमकता हुआ, किसान विकास को समर्पित गंगा किसान का कलेंडर छप गया | चपरासी को सक्त हिदायत के साथ कलेंडरो  की डिलेवरी के लिए भेजा की एक भी कलेंडर इधर से उधर नहीं होना चाहिए, क्यू की हमारे चपरासी के कई रिश्तेदार भी रास्ते में  है तो हमें डर था, की कही भैया जी सेखी में बांटते  हुए ना आ जाये | लेकिन कम्खत 10 कलेंडर गायब कर के ही माना |
अगले दिन दफ्तर का हर कर्मचारी समय के पहले ही पहुँच गया | मुझे ऐसा लगा की जैसे एरियर  का चेक मिलने वाला है | खैर सुबह आते ही मैंने एक कलेंडर हथिया लिया और बगल के मिश्रा जी के लड़के को बुला कर कहा की ये कलेंडर मेरे घर पंहुचा दे तो मिश्रा जी की राजदुलारे ने तुरंत सर्विस चार्ज के रूप में 20 रुपये मांग लिए | मै बोला अरे बेटा वो किस लिए, तो छूटके ने हमें ज्ञान दिया की दफ्तर से आफिस कम से कम ½ कि०मी० की दुरी पर है | ऐसे में कलेंडर को बचाते हुए पहुचना बड़ी मुस्किल काम है | पता नहीं किस की नियत ख़राब हो जाये | अच्छा अच्छा ये लो बीस रुपये, आज कल के लड़के ना बस, शिष्टाचार तो है ही नहीं, अरे हमारे ज़माने में तो आँख बंद करके बड़ो की आज्ञा का पालन करते थे | तो छुटकू बोला मै भी आँख बंद कर के आज्ञा मान सकता हूँ, लेकिन कलेंडर घर पहुचे गा ,की नहीं, ये नहीं कह सकता | मैंने बहस बढ़ाने की बजाय 20 /- देना ज्यादा मुनासिब समझा | खैर थोड़ी देर में ही हम दफ्तर में बैठ कर कलेंडर देख रहे थे | वाकई कलेंडर बहुत ही खुबसूरत छपा था, की बाहर से आवाज आई, अरे गुप्ता जी है {अरे गुप्ता जि मतलब हमारे बड़े साहब, जिनकी कृपा से और सुझाव से ये कलेंडर छपा} | तभी चपरासी दौड़ते हुए आया और बोला आफिस के बाहर भीड़ लगी है | पार्टी वाले, ब्रोकर , और क्यू की हमारा दफ्तर रेसीडेंसी में था, तो मोहल्ले वाले भी इक्कट्ठा हो गए थे | बड़े साहब ने पूछा ये भीड़ क्यू हो रही है, तो चपरासी बोला साहब सब लोग कलेंडर खातिर जमा हुए है | ये सुनना था की मै और खान साहब अपना सर पकड़ कर बैठ गए और बड़े साहब के साथ वरिष्ठ विपणन अधिकारी जी केबिन में गुप्त मंत्रणा करने लगे |  अरे यार इस लिए नहीं की कोई खेला करना है, बल्कि इस लिए की, छपे हुए कलेंडर को कैसे बचाना है |      

|| इति ||

Friday, 8 January 2016

एक दिन घर की मुसीबत |

एक दिन घर की मुसीबत |

नगर निगम की सप्लाई वाला पानी रोज सुबह 4 बजे से 5 बजे आता है | सर्दी में कौन ससुरा उठे | 5 बजे जब पानी चला जाता है तो 8 बजे आता है | तब ससुरी लाइट चली जाती है | हम रोज सर्दी में नहीं उठते, माफ़ करना कभी नहीं उठते, कौन 4 बजे उठे क्यू की हम तो पति परमेश्वर है बेचारी पत्नी ही उठती है क्यू की वही चरणों की दासी है {ऐसा खुश करने के लिए लिख दिया है} और हम आराम से रजाई में अपने दो बच्चो के साथ दुबके रहते है | लेकिन माँ का दुलारा तुरंत 4.30 बजे उठ जायेगा और एक ही कविता दोहराएगा | पापा उठो मम्मी ने पानी भर लिया | लेकिन मै और मेरी दुलारी टस से मस नहीं होते | कभी दुलारा ज्यादा कविता दोहराने लगता है तो मन करता है की कान के नीचे दे काईदे से लेकिन सोच कर ही डर जाता हूँ की अगर धर्मपत्नी ने रजाई में अपना ठंढा हाथ भी डाल दिया तो लेटे लेटे ही हार्ड अटैक आ जायेगा | लेकिन सुई इस बार थोड़ी उल्टी घूम गई | अब भैया पानी भरने की डियूटी मेरे सर पर आ गई | धर्मपत्नी जी रिश्तेदारी में जरा शादी में चली गई बच्चे परेशान ना करें इस लिए वे हमारे पास ही रह गए | अब रोज 4 बजे कौन ससुरा पानी भरने उठे क्यू अरे भाई पहले ही बता चूका हूँ की हम तो पति परमेश्वर है | लेकिन  चरणों की दासी घर पर नहीं है | तो सुबह उठे और तो पता चला की रत में जो पानी भरा था वो तो बहुत ठंढा है इस लिए फ्लस में डाल दिया लेकिन जैसे ही डाला याद आया, की अमे ब्रश कैसे करोगे | अच्छा चलो कोई बात नहीं आज सन्डे भी तो है |  तभी मेरी पत्नी का दुलारा आ गया पापा ब्रश करना है मैंने कहा हां बेटा बस अभी लो | बिस्तर के सिरहाने देखा तो जग में पानी भरा था उसी से अपने चिंगू मिन्गु का मुह धुलवाया और अपना भी धोया | लेकिन भाष नहीं सो सका क्यू अरे मिया अभी बताया ना की पानी नहीं था वो 8 बजे आयेगा | अगर ब्रश करते तो मुह कैसे धोते | बेटी तो मेरी अकलमंद है उसे कोई समस्या नहीं नाकिन पुत्र श्री तुरंत बोले ब्रश नहीं किया | उसे इस बात का यकीन दिलाने में 1 घंटा बीत गया की शेर ब्रश नहीं करते | खैर 8 बजे पानी आया ये तो शुक्र था की बाल्टी लेकर ही बैठा था वरना एक बाल्टी भी नहीं मिलता | सोचा था इस पानी में जबरदस्त पकवान बनायेगें | लेकिन फिर समस्या पुत्र श्री को नहाना है अरे भैया अगर नहाओगे तो खाना क्या खाओगे | लेकिन नहीं | मन ही मन अपने ख्यालों में उसकी ठुकाई पिटाई करते हुए आधी बाल्टी में पुत्र पुत्री को काग स्नान करवाया | अब सोचा चलो किचन में चाय ही बनाया जाय फिर समस्या मम्मी तो रसोई में बिना नहाये नहीं जाती | आप ने रसोई गन्दी कर दी | ये मेरी समझदार पुत्री की आवाज थी | ऐसा लगा जैसे कभी कभी समझदारी भी खराब बात होती है | हमने पाला बदला बेटा मै तो झाड़ू लगाने की सोच रहा था | मेरा इतना कहना था की पुत्र श्री तुरंत झाड़ू ले आये | मैंने बिस्पोत किया किताब लेन को कहता हूँ तो लाने में साल भर लग जाते है और झाड़ू तुरंत आ गई | सफाई जरुरी है उसकी बहन बोली | सर पकड़ कर झाड़ू लगानी शुरू की; भगवान का शुक्र था पोछा भी सफाई का एक हिस्सा है किसी के दीमक में नहीं आई | वरना वो भी लगाना पड़ता | खैर साफ सफाई के बाद चाय बिस्कुट और दोपहर में मैगी | दिन भर धमा चौकड़ी | शुक्र है शाम को श्रीमती जी आ गई वरना मेरा तो दम ही निकल जाता \ वैसे मैंने शाम को पानी भर लिया था | शाम को जब श्रीमती जी का फोन आया की मै आज नहीं आउंगी  तो लगा अब शारीर में प्राण ही नहीं रहेगें | ये प्रेम नहीं भैया घर संभालना बापों का काम नहीं है | मै एक दिन में एक हज़ार फाइलें निपटा सकता हूँ; बॉस की एक लाख गाली खा सकता हूँ; आफिस आये फरियादियों से नोक झोक कर सकता हूँ लेकिन घर और बच्चे नहीं सम्भाल सकता | मुझे चक्कर आ रहा है, लगता है, बिहोस हो गया हूँ | तभी नरम मुलायम लेकिन ठन्डे  हाथ मेरे माथे पर पर गए तो  कम्बखत  चीख निकल गई अरे भैया पानी मत गिराओ | अरे कहाँ है पानी ये आवाज, अरे ये आवाज तो अपनी प्राणों की प्यारी की है | अरे तुम, भाई तुमने तो कहा था आज नहीं आओगी | उन्होंने मेरे साइन पर सर रखते हुए कहा “मेरा मन आपके बिना नहीं लगता” वैसे मेरा भी नहीं लगता | सच्ची | हाँ मुच्ची | वैसे आज दिन भर क्या क्या किया | हम बताएगें | चिंगू मिन्गु  बोले \ मै सोच रहा था की लगता है भैस पानी में आज चली जाएगी | श्रीमती जि उन दोनों की बाते ध्यान से सुन रही थी और मेरी तरफ देख कर मुस्करा रही है | वैसे वो मुस्कुरतें हुए बहुत अच्छी लगती है |    

Monday, 4 January 2016

औरत के सपनों का मतलब

रात में एक चोर घर में घुसा। कमरे का दरवाजा खोला तो बरामदे पर एक औरत  सो रही थी। खटपट से उसकी आंख खुल गई। चोर ने घबरा कर देखा तो वह लेटे लेटे बोली, ''भैया, तुम देखने से किसी अच्छे घर के लगते हो, लगता है किसी परेशानी से मजबूर होकर इस रास्ते पर लग गए हो। चलो कोई बात नहीं। अलमारी के तीसरे बक्से में एक तिजोरी है। इस का सारा माल तुम चुपचाप ले जाना। मगर पहले मेरे पास आकर बैठो, मैंने अभी-अभी एक ख्वाब देखा है। वह सुनकर जरा मुझे इसका मतलब तो बता दो।"

चोर उस औरत की रहमदिली से बड़ा अभिभूत हुआ और चुपचाप उसके पास जाकर बैठ गया।

औरत ने अपना सपना सुनाना शुरु किया, ''भैया, मैंने देखा कि मैं एक रेगिस्तान में खो गइ हूँ। ऐसे में एक चील मेरे पास आई और उसने 3 बार जोर जोर से बोला सुनो जी ! सुनो जी सुनो जी ! बस फिर ख्वाब खत्म हो गया और मेरी आँख खुल गई। जरा बताओ तो इसका क्या मतलब हुआ?''

चोर सोच में पड़ गया। इतने में बराबर वाले कमरे से औरत का पति आवाज  ज़ोर ज़ोर से सुनकर आ गया और अंदर आकर चोर की जमकर धुनाई कर दी।

औरत बोली, ''बस करो जी अब यह अपने किए की सजा भुगत चुका है।"

चोर बोला, "नहीं-नहीं, मुझे और मारो सालें, ताकि मुझे आगे याद रहे कि मैं चोर हूँ, सपनों का मतलब बताने वाला ज्योतिषी नहीं।"