Tuesday, 27 September 2016

बहुत हो चूका शोर, अब सूरत बदलनी चाहिए |

माननीय प्रधानमंत्री जी मै आप की सारी बातों का समर्थन करता हूँ, जो आप कहते है, करते है, लेकिन एक बात बताइए की आप की सरकार और दूसरी सरकारों में क्या फर्क है, वे भी आप की तरह ही बात करते थे, फर्क सिर्फ इतना है की आप अपनी बात ज्यादा असरदार तरीके से करते है | आप  केरल में जो बोलते है, सही है, लेकिन करते नहीं, उसकी जिम्मेदारी नहीं  लेते | सुषमा जी UN में जो कहती है, वो भी सही है, लेकिन किया क्या, सिर्फ कहा, बस हमारी जिम्म्मेदारी ख़तम | और अगर ख़तम तो फिर चुनाव के समय क्या था | आज आपने पुरे विश्व का सफ़र किया | लेकिन आप के समर्थन में कितने है, जो पाकिस्तान को अलग थलग कर दे | इसका जवाब शायद आप ना दे पाए | लेकिन इसका जवाब मैं दे सकता हूँ,  जवाब है कोई नहीं | फिर आप की निति और दूसरों की विदेश निति में क्या अंतर | वो भी तो यही कर रहे थे भाषण, और भी बस भाषण | ध्यान रखिये आप बहुत अच्छे से तैयारी करे, खूब मेनहत करे और परीक्षा में रिजल्ट आया तो फेल | अपना पिता जिसने हमें पैदा किया है वो भी हमारी तैयारी पर शक करेगा | फिर हम तो पडोसी है | जब आप कहते है, शहीदों की शहादत बेकार नहीं जाएगी, या हम क़ुरबानी याद रखेगें तो क्या | अरे याद तो वो बात भी रक्खी जाती है, जब आप किसी पराई स्त्री से छेड़ छाड़ करते है या जब आपकी घर की महिला के साथ कोई अभद्र व्यव्हार करता है | दोनो ही बातों में सम्मान नहीं है ना आपकी बात में और ना ही मेरे उदाहरण में | जब आप को पता चलता है की आप कुछ नहीं  कर पा रहे है, तो आप सिन्धु नदी समझोते की बात  करने लगते है | ये बात को  घुमाने का एक तरीका का है और कुछ नही | चलिए मैं एक बात आप से और  आपके सरकार में शामिल सभी नेताओ मंत्रियों से पूछता हूँ की अगर आप के घर से कोई भाई बेटा भी  कश्मीर और सरहद पर मर जाता तो क्या तब भी आप सब इन्ही शब्दों का प्रियोग करते | भाई साहब जब आप के घर से कोई  मर  जायेगा सड़क पर भी और  मैं यही शब्द आप लोगो से आकर कहूँगा तो शायद आप मुझे गोली  मार देंगे और  नहीं  मारेगें तो ये हाल तो कर ही देंगे की मैं किसी  काबिल ना रहूँ |
माननीय प्रधानमंत्री जी दूसरों को उपदेश देना शायद इस दुनिया का सबसे सस्ता और आसान काम है | लेकिन जब अपने पर गुजरती है तो इन्सान त्राहिमाम त्राहिमाम कर उठता है | क्या आप के पास इतनी हिम्मत है की आप सिन्धु नदी समझोता रद्द कर  सके | जवाब है नहीं | आज आप बहुमत में है और एक बिल पास नहीं करवा पा रहे है, कहते है की, राज्य सभा में आप को बहुमत नहीं है | जब की हाईस्कुल की किताबों में पढाया जाता है की, लोक सभा अगर कोई बिल पास कर के राज्य सभा में  भेज दें तो राज्य सभा की औकात नहीं है की उस बिल को रोक दे | और आप  बहुमत का रोना रो रहे है | आप की हालत भगवान श्री सत्यनारायण की कथा में उस बनिए की तरह है जो हर बार कथा सुनने के समय कहता है की मेरा ये काम हो, जायेगा तो कथा सुनुगा, लेकिन काम हो जाने पर फिर अगला बहाना | आपकी पिछली सरकार राम मंदिर के मुद्दे पर आई थी | लेकिन किया कुछ नहीं, वही घिसा पिटा भाषण बहुमत नहीं है | न्ययालय के आदेश का पालन करेगे | तो फिर भैया पहले बोला क्यू | पहले श्री राम के नाम की दलाली और अब काला धन /पकिस्तान/ चीन के नाम की दलाली |
माननीय प्रधानमंत्री जी याद रखियेगा जब लोगों ने वाजपेई को नहीं छोड़ा तो तुम्हे क्यू छोड़ देंगे | लोगो को इस बात बात का अहसास मत दिलवाओ की यार  इससे तो अच्छी कांग्रेस ही थी | आप को परिवर्तन के लिए  चुना गया है  ना की परिवर्तित होने के लिए या सिर्फ मन की बात करने के लिए |
माननीय प्रधानमंत्री जी आज देश की समस्या आपकी समस्या है और देश में ऐसा कौन है  जो एक पूर्ण बहुमत से आई सरकार को आँख दिखा दे | और अगर वो आँख दिखा रहा है तो सिर्फ इसका एक कारण है की हम सिर्फ बकैत हो गए है आज पडोसी के  हर पानी नहीं आ रहा है  वो  इसके  लिए  आप को जिम्मेदार मान रहा है | वो ये कह सकता है क्यू की उसे अपनी नपुंसकता छिपाने के लिए मोदी जी का सहारा चाहिए | वो अपनी जिम्मेदारियों को आप पर  थोपना चाहता  है | वह ऐसा  कर  सकता है क्यू की उसे पता है की आप पलट कर वार नहीं करेगे | बचपन में एक कहानी सुनाई जाती थी की, एक हाथी बाजार में चला जाता है और  कुत्ते उस भोकते रहते है लेकिन ये  अधूरी कहानी है | पूरी कहानी  ये है की जब हाथी कुछ नहीं करता तो कुत्तों की हिम्मत बढ़ जाती है और वो सब मील कर उस हाथी  को नोचने लगते है | हाथी इन सब से दुखी हो जाता है उसे दुखी देख कर गधा उसे समझाता है की जरुरत से ज्यादा शराफत कायरता की निसानी है | हाथी  को ये  बात समझ में  आ जाती है और  अगले दिन जब वो बाजार  से गुजरता है तो  कुत्ते फिर उस पर  कूदते है लेकिन हाथी इस बार  सावधान है |  वो एक कुत्ते को पैर से दबाता है दुसरे को सुढ से पटकता है | ये देख सारे कुत्तों को  अपनी औकात पता चलती है | उस दिन के बाद कोई  कुत्ता उस पर नहीं भोक्ता बल्कि उसके आने पर  रास्ता छोड़ देतें है | यहाँ  आप  की स्थिति उस हाथी जैसी है और आप चाहे तो मुझे गधा समझ सकते है | क्या आप ने कभी सोचा है  की आज चीन के लिए  आपके पास कोई  पोलिसी नहीं है | वो देश पाकिस्तान के कंधे पर बन्दुक रख कर  भारत पर गोली दाग रहा है | इतने देशों की यात्रा की लेकिन कोई साथ नहीं | तो फिर काहे की संबंधों की नौटंकी | वैसे आप मुझसे ज्यादा समझदार है और मुझसे ज्यादा काबिल लेकिन एक बात कहना चाहूँगा, की जिसके शरीर पर जख्म होता है, इलाज भी खुद  करता है | फिर पडोसी कितना भी अच्छा क्यू ना हों वो सिर्फ उपदेश दे सकता है या हाल चाल पूंछ सकता है | आप  अलगाववादी नेताओ का इलाज नहीं  कर  सके | कश्मीर में जो भी समस्या है वो  इनकी वजह से है | आप दाउद का भी कोई इलाज नहीं कर  सके | पाकिस्तान से ज्यादा शुभ चिन्तक तो उसके भारत में बैठे है | अरे उसे तो छोडिये आप शत्रुघ्न सिन्हा पर लगाम नहीं लगा सके, तो आप  कैसे  सोच कर बैठे है की, आप दूसरों  से बेहतर प्रधान मंत्री है | आप और मनमोहन सिंह में क्या  फर्क आप  बोलते  है और वो  कुछ नहीं बोलते बाकि सब समान | और याद रखिये मनमोहन की पहली सरकार में भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे थे वो  दूसरी बार में थे | लोगों को ये सोचने पर मजबूर मत कीजिये की मोदी देश के प्रधानमंत्री इसलिए नहीं है की वो सर्वश्रेष्ट है बल्कि इसलिए है की जनता के पास कोई विकल्प नहीं था | और अगर परिस्थितियां स्वम से समझ नहीं आती तो इंदिरा का कार्यकाल देख लीजिये उनके शासन में जंग और खालिस्तान का मुद्दा उठा और उसका हल भी उन्होंने ही निकला | याद रखिये हमारे बाद दुनिया हमें किस रूप में याद रखती है ये महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्वपूर्ण सिर्फ इतना है की हम अपने आपको कैसे याद रखवाना चाहते  है |
माननीय प्रधानमंत्री जी इंदिरा, लालबहादुर या वाजपेई ने  जो किया, उस पर राजनीती में तो गलत कहा  जा सकता है लेकिन वो जनता की नजर में हीरों है | और रहेंगे भी | तो सवाल ये है की  आप  कैसे  जीना या याद रखना चाहते है | मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ की बहुत हुई बाते, अब जख्म का  इलाज होना चाहिए ना की इस इन्तेजार में  बैठा जाये  की  हमारे प्यारे पडोसी उस पर  दवा लगायेगें | क्यू की जख्म नासूर हो  गया है, जैसे हमने पंजाब से खालिस्तान का नाम मिटाया  वैसे ही कश्मीर से  भी पाकिस्तानी कश्मीर का नाम मिटना चाहिए | नहीं तो एक काम की सलाह है की आप वापस  गुजरात चले जाये और  हमें आपने  हाल पर  छोड़ दे | कहीं ऐसा ना हो की देश जाते जाते गुजरात भी चला जाये |
शुभकामनाओ के  साथ आपके द्वारा की  गई वास्तविक प्रतिक्रिया के इन्तेजार में |

दीप           

Tuesday, 13 September 2016

मेरी इंजीनियरिंग के दिन

ये कहानी है उस दौर की..
जब कॉलेज में २ कंपनियां आके चली गयीं थी...
और मेरा प्लेसमेंट अभी नहीं हुआ था..
हौसला बढ़ाने के लिए घर पर माँ थी ..
और महीने में एक बार फोन करके पैसे हैं कि नहीं पूछने वाले पिताजी भी..
पर मैं उन्हें अपनी मनोदशा बताना नहीं चाहता था ..
हाँ एक और भी तो थी मेरे पास..
जो सब जानती थी .
जो हिस्सा रही है इस सफर का..
2004
से 2008 तक..
कहानी अब 2005 में हैं..
जब इंजीनियरिंग कॉलेज में एक साल पूरा हो चूका था..
और तमाम रैगिंग और शुरूआती इंटेरक्शंस के बावजूद..
मैं किसी से भी ज्यादा घुल मिल नहीं पाया था..
वो थी मेरे ही आस पास.
कई बार बुक बैंक में नज़रें मिली..
कई बार एक ही टेबल पर आमने सामने पढ़े..
नेस्कैफे पर एक ही ग्रुप में खड़े हो कॉफी पी थी..
पर मैं सिर्फ उसका नाम ही जान पाया था..
और ये भी श्योर नहीं था ..कि वो भी मुझे नाम से जानती है क्या....
मुझे याद है...
मेरी और उसकी बॉन्डिंग पहली बार..
एनुअल कॉलेज फेस्ट में हुई थी..
जब हम दोनों ही नीली जीन्स और ग्रे टी शर्ट में कॉलेज आये थे..
और कॉलेज रॉक बैंड के परफॉर्म करने पर..
भीड़ से पीछे की तरफ खड़े हो..
बाकी लोगों को सर हिलाते और नाचते देख रहे थे..
शायद मन था भीड़ में शामिल होने..
शायद झिझक भी थी..
इसीलिए हर बीट पर..दोनों के दाहिने पैर टैप कर रहे थे..
तब तुमसे पहली बार बात हुई थी..
मैंने सीधे तुम्हारा नाम ही लेके बातें शुरू की थी..
और उन लोगों पे जोक मारा था..
जो नाच रहे थे हैड बैंगिंग करते हुए..
तुम खिलखिला के हंसी थी..
फिर तुमने मुझसे पूछा..
मैं रेगुलरली बुक बैंक क्यों नहीं आता हूँ..
और मैंने जवाब दिया था...बस यूं ही..
तुम फिर से मुस्कुराईं थीं..
उस दिन हमने फोन नंबर भी एक्सचेंज किये..
और फैस्ट ख़त्म होने के बाद..
मैं इधर उधर की बातें करता हुआ..
तुम्हारे साथ वाक् करते हुए तुम्हारे हॉस्टल के गेट तक गया था..
तुम मेरे फ़ालतू जोक्स पर भी हंसती रहीं थीं..
उस शाम मैंने सिगरेट नहीं पी..
और रात में तकरीबन १२:३० बजे..
अपने नोकिआ ११०० से "It was nice talking to you " मैसेज किया था..
फ़ौरन मेरे फोन की बीप बजी..और मैंने उत्सुकता से मोबाइल देखा..
वो मैसेज की डिलीवरी रिपोर्ट थी..
उन दिनों मोबाइल में मैसेज बीप बजना..
एक अलग ही अहसास होता था..
२ मिनट बाद ही तुम्हारा रिप्लाई आया.."same here :) "
फिर अगले दिन मैं अपने रूम पार्टनर की प्रेस की हुई शर्ट पहन कॉलेज पहुंचा था..
और हमारी बातों के सिलसिले उस दिन से शुरू हो गए थे..
कैंटीन से लेके..कॉफ़ी तक..
और लैब से लके बुक बैंक तक..
हम साथ ही रहते..
और कॉलेज से लौटने के बाद..
मोबाइल पर मैसेज..
मुझे याद है.. तुम कैसे पढ़ते वक़्त अपनी उँगलियों में पैन घुमाया करती थीं..
और न्यूमेरिकल सॉल्व करते वक़्त कैसे अपने बालों की लट को कान के पीछे ले जाया करतीं थीं..
तुम कुछ पूछ न लो इस डर से मैं भी पहले से ही पढ़ के आया करता..
और बुक बैंक में नज़रे बचा कर बस तुम्हे देखता..
मुझे आज तक याद है..
कि कैसे मैं कोशिश करता था कि फ़ोन मेमोरी फुल होने पे..
मैं तुम्हारे मैसेज डिलीट न करूँ..
कभी सिम में ट्रांसफर करूँ..
तो कभी ड्राफ्ट बना के सेव कर लूँ..
वो साथिया की रिंगटोन जो तुमने सेंड की थी..
वो तब तक मेरी रिंगटोन रही..
जब तक वो फोन मेरे पास रहा ..
मुझे याद है कि कैसे तुम कहतीं थी..
कि हर कैसेट में दूसरा गाना बैस्ट होता है..
मैं नहीं भूल सकता वो शाम..
जब हम पहली बार फिल्म देखने गए थे..
मैंने दोस्त की CBZ उधार ली थी..
और फिल्म से लौटते वक़्त बस अड्डे के पास गोल गप्पे खाए थे..
उस शाम जब मैंने तुम्हे हॉस्टल छोड़ा था..
तब कैसे हॉस्टल की एंट्री के पास..
हमने घंटों बेवजह की बातें की थीं..
तुम अंदर नहीं जाना चाहती थीं..
और मैं भी वापस नहीं जाना चाहता था..
बातों बातों में रात का 1 बज गया था..
उस दौर में नींद भी कहाँ आती थी..
मैं नहीं भूल सकता वो अनगिनत बार जब तुमने कहा था..
कि मेरे जैसे लोग इस दुनिया में रेयर हैं..
और कैसे तुम लकी हो मुझ जैसा दोस्त पाके..
अगले ३ साल हम साथ साथ ही थे..
कई बार लड़े..पर हर बार या तो तुमने या मैंने एक हफ्ते की ख़ामोशी के बाद..
बात करने की शुरुआत कर ली..
आखिरी सेमेस्टर से पहले तक सब ठीक ही चला..
तुम कैट की तैयारी करती रहीं..
और मैं कैंपस प्लेसमेंट की..
याद है जब कंपनी आने का नोटिफिकेशन हम दोनों ने साथ ही नोटिस बोर्ड पे देखा था..
और कंपनी क्रिटेरिया में थ्रू आउट फर्स्ट क्लास माँगा था..
मैं उदास हो गया था ये देख..और तुम्हारी आँखों में चमक थी..
तुमने कहा था कि चलो अच्छा है कम्पटीशन कम हो जाएगा..
पर तुम मेरी आँखें नहीं पढ़ पायीं थी..
ख़ैर मैंने भी कभी बताया नहीं..
कि कैसे बारहंवी के पेपरों में..
मेरा अपेंडिक्स का ऑपरेशन हुआ था..
और मैं कम्पटीशन से बिना फेल हुए ही बाहर हो गया..
जिस दिन इंटरव्यू हुए..
मैं कॉलेज ही नहीं आया..
तुम्हें बेस्ट ऑफ़ लक का मैसेज किया..
और बैठा रहा हॉस्टल के कमरे में..
शाम को तुम्हारा मैसेज आया..सिलेक्टेड..
मैंने congrats रिप्लाई किया..
और तुमने नाम गिनाये कि किस किस का सिलेक्शन हुआ है..
२ दिन बाद तुम्हारे साथ सेलेक्ट हुए लोगों की पार्टी कि खबर भी ऐसे ही उड़ते मिली..
अगली कंपनी आई..
उसमे भी वही क्रिटेरिया था..
मैं अब निराश हो चला था..
और तुम्हारे भी दोस्त बदल चुके थे..
अब तुम्हारे पास एक नया ग्रुप था..
वो लोग जो एक साथ उस कंपनी में प्लेस हुए थे..
और मेरे आस पास..
मेरी ही तरह हारे लोग..
जो एजुकेशन लोन के तले दबे थे..
या अपने परिवार के सपनों तले..
आखिरी सेमेस्टर था..
इस बार तुम्हारे बुक बैंक के साथी भी बदल गए थे..
और मैंने भी बुक बैंक आना बंद कर दिया था..
अब मैसेज टोन भी कम ही बजती थी..
और साथिया वाली रिंगटोन मैंने सिर्फ तुम्हारे नंबर पर ही असाइन कर दी थी..
एक awkward सी ख़ामोशी आ चुकी थी हम दोनों के बीच..
मैं कई बार तुम्हे फोन करके रोना चाहता था..
अपनी असफलता की कहानियां सुनना चाहता था..
कई बार नंबर डायल करके रिंग जाने से पहले मैंने काट दिया..
वो अँधेरे के दिन थे..
फाइनल एग्जाम वाले दिन हम लगभग एक अजनबी की तरह ही मिले..
तुमने पिछले ३ साल याद किये..
और मुझे बताया कि कैसे I have been the best person you have ever met ..
हमने एक और बार कॉफ़ी साथ पी..
जो संभवतः हमारी आखिरी कॉफी थी..
मैं उस शाम जयदतर खामोश ही रहा..
जब कॉफ़ी ख़त्म हुई तो मैंने पूछा..
चलो हॉस्टल छोड़ देता हूँ..
तुमने मुस्कुरा कर कहा..नहीं..
अभी किसी के साथ मूवी का प्लान है..
उस "किसी" का अंदाजा मुझे भी था..
क्यूंकि वो नेस्कैफे के पीछे से शशांकित भाव से मुझे देख रहा था..

पर जिसकी वक़्त ने ली हो..वो दर्द से कराह भी नहीं पाता..
मैं चुप ही रहा..
और तुमने जाते जाते कहा ..
"Be in touch "
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आज अचानक बंगलौर में कोरमंगला में कॉफ़ी पीते तुम दिखीं..उसी "किसी" के साथ...और तुम्हारे सामने वाली टेबल पर बैठा मैं..अपने 3 और आईआईएम बैचमेट्स के साथ...2004-2008 सब आँखों के सामने तैर गया....तुम देख के भी खामोश रहीं..और मैं बिना किसी बात टेबल पर हाथ मार खिलखिला के हँसा... ;)