Saturday, 18 July 2015

मरा घोडा और अलविदा की वो नमाज

सब से पहले सभी भाइयों  को ईद की बधाई । कल अलविदा की नमाज थी, और शहरे लखनऊ में अलविदा के लिए भारी भीड़, सभी चाहते थे की वो नमाज की पांत में मोलवी के सामने सबसे आगे खड़े हो कर नमाज पढ़े  करे । कल सारा दिन टीवी पर अलविदा की भीड़ ही दिख रही थी, शाम को हमारी जाने हयात आई मीन मेरी पत्नी और मै चाय पी रहे थे की अचानक कक्कू का फोन आ गया दुआ सलाम के बाद ढेर सारी बात हुई, फोन रखने के बाद मुझे अचानक हसीं आ गई, बस हमारी धर्म पत्नी को सवाल पुछने का मौका  मिल गया । हमने उन्हें टालने की कोशिश की, लेकिन जब वो नहीं मानी तो बताना पड़ा । हाँ तो किस्सा ये था की पांच साल पहले अलविदा की नमाज़ घोड़े के साथ हुई, वो ऐसा हुआ की रमजान की महीने में हमारे गाँव में दिल्ली से कुछ कमासुत पूत जुम्मन मिया  घर आये और वो दिल्ली की बाते डींगे हांकते हुए बताया करते की गोया दिल्ली से नहीं न्यू यार्क से आये है । जहाँ जुम्मन मिया बैठते वही महफ़िल जम जाती बातों की ,  बस बातें ही बातें, खाने को तो कुछ मिलता ही  नहीं था । लगे हाथ कक्कू को भी पता चला की दिल्ली की जामा  मस्जिद में नमाज पढ़ना बड़े सौभाग्य की बात है बस तय हो गया की इस बार अलविदा की नमाज जामा मस्जिद में ही  पढ़ी जाएगी और तैयार हो गई 8 -9 युवा नमाजियों की  सेना।  सभी जुम्मन मियां के यहाँ पहुंचे पता पुछने, वो  क्या है की कभी कोई दिल्ली तो क्या इलाहबाद भी नहीं  गया था । पहले तो हमारे जुमन मियां ने समझाने की कोशिश की लेकिन लोग तो खुटा गाड़ के ही बैठ गए, तभी  आपा  ने डांटा बताते क्यू नहीं , इन्हें भी तो पता चले की दुनिया में क्या हो रहा है । डर के मारे जुम्मन मिया ने पता बताया की स्टेशन से यहाँ उतरो, यहाँ बस पकड़ो, यहां पैदल चलो, यहाँ  घुमो, यहां मुङो वगेरा वगेरा । सभी भाइयो ने बाकायदा कागज - कलम से नक्शा भी बना लिया । घर पहुंचे, घर वालो को खुसखबरी सुनाई । बस हर तरफ बधाई शुरू, की फला  मिया, चचा का सपूत जामा मस्जिद में अलविदा की नमाज पढ़ेगा । कसम खा कर  कहता हूँ  की  ऐसा लगता था की जामा  मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ने जा रहे है ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में स्नातक का एड्मिसन हो गया है और अब वही पढाई होगी । मेरी दादी भी बहुत खुश थी की गांव  का नाम हो रहा है और साथ ही अब अपने  खेत में कुछ दिन कक्कू की बकरिया नहीं आएगी । खेत में बोई हुई ककड़ी और खीरा भी बचेगा, वो क्या है की कक्कू की वजह से खेत से कभी भी हमारे घर ये सब नहीं आ पाता  था कक्कू ही खा पी कर साफ किये रहते थे खेत में बतिया लगी नहीं की कक्कू ने सफाया किया नहीं,पाचन क्रिया दुरुस्त रहे इसके लिए वो हमेशा एक पुड़िया में काला नमक हमेशा अपनी जेब में लिए रहते थे । हाँ तो भाई वो शुभ  दिन आ गया कक्कू, फेकूं , ऑफिश,रजा , सौकत , मुनकू , अच्छे , जमील सब तैयार । गाव वालो ने गाजे बाजे के साथ सभी को बिदा  किया । जब सब भाई प्रतापगढ़ स्टेशन पर पहुंचे तो याद आया की यार रिजर्वेशन  तो किसी का है ही नहीं । लो गई भैस  पानी में । इन आठो में सौकत पांचवा पास था । बाकि सात उसे ऐसे देख रहे थे जैसे वो अन्धो में काना राजा है । अब सौकत की डिग्री की बात थी डिग्री मतलब पांचवीं पास की मार्कशीट,  समझती नहीं हो । मैंने धर्म पत्नी  के पूछे प्रश्न का जवाब दिया । अब टोकना मत । हाँ तो भैया पहुंचे एक साहब के पास, साहब मतलब पता नहीं लेकिन सफ़ेद कपड़ो में टोपी लगाये गेट पर खड़ा था । साहब भी शरीफ इन्शान थे तुरंत बोले अमे गाड़ी आ रही है टिकट लो और जनरल में घुसो । टिकट लेने की जिम्मेदारी दी गयी मुनकू को।  मुनाकू वो पक्का पंसारी, दीमाक लगाया की पिछली बार जब अंतु जा रहा था तो कितनी भीड़ थी, और भीड़ में किसी ने टिकट पूछा तक नहीं और वो स्टेशन के पीछे वाली टूटी दिवार से निकल लिया था, सो उसने टिकट लिए कुल जमा 7 । अपना नहीं बनवाया टिकट सोचा फालतू में कौन  पैसे बर्बाद करे वो तो फिर से टूटी दिवार से निकल लेगा । अच्छा लो तो ट्रैन आ गई नाम था काशी विश्वनाथ । खचा खच भरी , लगता था की जैसे सब जामा मस्जिद ही जा रहे है । तीन एक डब्बे में चढ़े, चार दूसरे में  बस मुनकू चढ़े, रसोई यान में  । कक्कू, फेकूं , ऑफिश को किसी तरह शौचालय में जगह मिली । रजा , सौकत ,अच्छे , जमील पायदान के पास।  लेकिन अपना मुनकू आराम से कद्दू के बोर पर बैठा था वो क्या है की उसे पता नहीं था की रसोई यान में भी शीटें  होती है । ट्रैन अपनी पूरी रफ़्तार से भाग रही है।  तभी समोसा बेचने वाले एक कर्मचारी की नजर मुनकू पर पड़ी । उसने दबोचा क्यू बे चोरी कर रहा है अयं तभी सोचु रोज अंडे और आलू कैसे कम हो रहे है आज पकड़ में आया है तेरी टाँगे टुटेगीं तो समझ आएगा । मुनकू की तो नानी ही मर गई ये तो वही मिसाल हुई की चले तो थे हरी  भजन को ओटन लगे कपास । खैर  मुनकू मियां की पेशी रसोई यान के मैनेजर के सामने हुई । मैनेजर बड़ा कड़क, तुरंत हुकुम जारी मुर्गा बनाओ साले को । तभी संयोग से किसी बावर्ची ने पीछे से आवाज लगाई , मुर्गा आ गया हो तो काट कर ले आओ ये सुनना  था की मुनकू  को चक्कर आने लगा । बेचारा मुनकू बड़े हाथ पैर जोड़े, दुहाई दी लेकिन मैनेजर टस  से मस नहीं हुआ आखिर मुर्गा बनना पड़ा, वो उस समय को कोस रहा था जब वो इस खाली डब्बे में चढ़ा । कास अच्छे की बात मान ली होती तो ये दिन तो नहीं देखना होता । हर आने जाने वाला कर्मचारी  उस की पीठ पर हाथ गरम कर के जाता । आखिर कर एक बुजुर्ग कर्मचारी को उस पर दया आ गई और उसने इस मुर्गे को मतलब मुनकू को इंशान  बनाया । उस दिन मुनकू को मास्टरजी की बात याद आ गई की मुनकू पढ़ लो वरना सब तुम्हे गधा ही समझेगें । वक्त ने मुनकू को इस चलती ट्रैन में ही गधा , मुर्गा और इंसान के बीच का फर्क बता दिया था । इधर कक्कू, फेकूं , ऑफिश शौचालय  में बंद पड़े है कोई चिल्ला रहा है , दरवाजा पिट रहा है गरिया रहा है अबे साले  निकल वरना मेरी चड्ढी में ही निकल जाएगी । लेकिन तीनो ने दरवाजा नहीं खोला । इस लिए नहीं, की एक बार बाहर आने के बाद दुबारा नहीं घुस पायेगे बल्कि इस लिए की अगर बाहर निकले तो तीनो की खूब पिटाई होगी । सो किसी तरह नाक बंद किये तीनो शौचालय  में ही बंद पड़े रहे । दूसरे डब्बे में पायदान के पास पड़े  रजा , सौकत ,अच्छे , जमील लातो  के निचे दबे हुए कराह रहे थे।  ये कम था  की एक बेगम साहिबा गम लेकर आ गयी । उल्टियाँ हो रही थी, क्या करे किसी की समझ में नहीं आ रहा था । बेचारे कक्कू सोच रहे थे की एक बार जामा  मस्जिद में नमाज़ पढ़ आये  उसके बाद दुबारा कभी ऐसी हिमाकत नहीं करेंगे अपनी कुएं  वाली मजार ही भली वही मक्का वही गाजा । खैर लात- घुसे, शौचालय की बदबू सूघते, मुर्गा-मुर्गी बनते सभी नमाजी नई  दिल्ली सेंट्रल स्टेशन पर पहुंचे । बाहर निकल कर सभी ने चैन की साँस  ली, लेकिन अभी मुसीबत ख़तम  कहाँ  हुई थी । मुनकू मिया टूटी दिवार ढूढ़  रहे थे निकलने के लिए, मुनकू को इस बात का संतोष था की भले ही मुर्गा बनना पड़ा लेकिन टिकट के पैसे तो बचा ही लिए ।  लेकिन ये क्या यहां तो कोई टूटी दिवार ही नहीं है निकले कहाँ से । तभी जमील ने आवाज लगाई की अरे मुनकुआ अबे खड़े ही रहोगे चलो । मुनकू ऊपर वाले का नाम लेकर साथ हो लिए और तक़रीबन तक़रीबन बहार आ ही गए थे की पीछे धीरे धीरे चल रहे रजा को टीटी  ने रोक  लिया और टिकट के लिए पूछा अब सबकी टिकट क्यू की मुनकू के ही पास थी इस लिए सब को लौटना  पड़ा । मुनकू को तो मनो काटे पर खून नहीं का हाल  हो गया । लगभग रजा को गरियाते हुए वो भी लौटा । मुनकू ने कापते हुए हाथो से 7 टिकट टीटी के  हवाले किये टीटी ने चेक किये अरे ये तो  7  ही है आठवां  कहाँ है अब सब सब मुनकू को देख रहे थे और बेचारा मुनकू आगे  होने वाले हस्ल को याद करके कांप  रहा था ।  टीटी ने घुड़की दी नहीं की मुनकू ने बकना शुरू कर दिया । बाकि बचे 7 अपना सर पकड़ कर बैठ गए । टीटी  सभी को जीआरपी  के हवाले  कर आगे बढ़ा । जीआरपी  का सिपाही  सभी को थाने  ले आया । थानेदार मुछुन्दर, उसकी मुछे  ही देख कर आठो  की हालत पतली हो  गई , मुनकू दौड़ा थानेदार के चरणो में गिर पड़ा ऐसे लगा जैसे साला अपने जीजा से मिल रहा हो । थानेदार पूछो सिपाही नाल  क्या किया इन सब ने, सिपाही बोला टिकट ना  है कहानी सुनाये है नई नई । क्यू बे कहानी  आवे  है थानेदार ने अर्दब में लिया । कक्कू ने हिलते हुए कहानी दोहराई । थानेदार बोला लो भैया  गमन का ममला होए , बैठे बैठे भ्रष्टाचार अयं , बोल बे । क्या कलयुग आ गया है जनता खुद भ्रष्ट  है और नेता से हिसाब लेवे है । बस  पुरे थाने में हा हा ही ही गूंज उठा मनो हास्य कवि सम्मेलन चल रहा हो । खामोश थानेदार चिल्लाया बंद करो सालो को । बड़े हाथ पैर जोड़े पर थानेदार तो थानेदार है बिना कुछ लिए छोड़ेगा थोड़े ।   जीआरपी के थाने  में रात  भर सभी मुनकू को लानत भेजते  रहे। बेचारा मुनकू  टिकट ही तो नहीं लिया था लेकिन अब क्या हो सकता था।  मुनकू को मास्टर जी की बात याद आ रही थी पढ़ ले नालायक वरना एक दिन थाने के चक्कर  लगाने पड़ेगें, लो लग गई । अगले दिन अलविदा की नमाज थी। सुबह हुई  थानेदार आया , सिपाही लपका ले दे कर मामला निपटाओ वरना गए और नमाज भी गई ।  सब ने फिर मुनकू की तरफ देखा बेचारा मुनकू टिकट के पैसे निकल कर थानेदार के पैरो में गिर पड़ा , बड़ी मिन्नत की , आखिर थानेदार पिघला, सिपाही को इसरा किया सिपाही ने  तेज डाटा और थाने  से बाहर निकाला । मुनकू गरियाया की साले  ने 250 रुपये जो टिकट से बचाये थे वो भी गए साले  दिल्ली वाले बड़े भिखारी होते है । खैर मुसीबत खत्म होने के बाद अचानक रजा को याद आया की जामा मस्जिद का  पता वो तो कागज में लिखा था और कागज तो कक्कू के पास है। कक्कू  ने खोजा, लेकिन वो कागज नहीं मिला पता नहीं कहाँ गिर पड़ा । लो फिर  गई भैस पानी में लगता है  कभी पानी से बाहर  आएगी ही नहीं  । तभी फेंकू बोला अरे कहे घबरा रहे हो आज अलविदा है सब वही जा रहे होंगे  हम भी पीछे पीछे हो लेंगे ।  सब को आईडिया पसंद आया। फेंकू ने खुदा का मन ही मन शुक्रिया किया क्यू की पहली बार ऐसा हुआ है, आज उसकी जिंदगी का बहुत बड़ा दिन था । पता नहीं किस किस के पीछे चले । चलते ही जा रहे है सड़क है की ख़तम  ही नहीं हो रही है अफ़िश सोच रहा था की अगर इतनी मेनहत उसने खेत में की होती तो इस बार खूब गेहूं पैदा होता । लेकिन अब क्या हो सकता है अब तो सड़क की लम्बाई ही नापनी पड़ेगी इन नालायको के साथ । चलते चलते वो जामा  मस्जिद तो नहीं लेकिन एक गली में जरूर पहुंच गए । अब ये संजोग कहे या कुछ और की अच्छे ने एक आदमी से जामा मस्जिद का पता पूछ लिया, जो अपने घर के सामने परेशान सा खड़ा था । उसने उन आठो  को बड़े गौर से देखा, मुस्कुराया और बोला ,लगता है आप लोग तो बड़ी दूर से आये  है जरा बैठिये आराम कीजिये वैसे भी 3 बजने वाले है अँधा क्या मांगे दो आँखे । बस  फिर क्या सब बैठ गए । मुह हाथ धोया , रोजा थे इस लिए कुछ खाया  नहीं, कुछ आराम करने  के बाद उस आदमी ने बताया की वह भी जामा  मस्जिद जायेगा नमाज के लिए लेकिन उसका घोडा मर गया है और मुंसिपल्टी  के आदमी नहीं आये अभी तक।  अगर आप लोग कुछ मदद कर सके तो बड़ी मेहरबानी होगी । सभी ने उसे बताया की मरे हुए घोड़े के चारो  पैर बांध देने चाहिए फिर बीच में एक लाठी  उसके पैरो में फसा कर टाँग  लो और  बाहर हर दो । वो आदमी तेजी से उठा और सब सामान लाया ।  अब आप तो जानते ही है की गांव  वाले मदद  करने के लिए हमेशा तैयार रहते है  । सभी जुट गये बांध डाला, लाठी फसाई, कंधे पर उठाया , और लेकर आ गए बहार।  घोड़े का मालिक बोला आप लोग यही खड़े रहिये मै ताला लगा लू बस।  भैया ताला  लगाने गए और लौट के वापस ही नहीं आये।  घर के बाहर कंधे पर मरा हुआ घोडा लटकाये खड़े इन लोगो को पुलिस वाले भाई ने लताड़ लगाई।  अब मरता क्या न करता कितना समझाया की ये उस आदमी का है जो अंदर ताला लगाने गया है। लेकिन वो नहीं माना । सिपाही ने पूछा किस आदमी का, नाम तो किसी ने उसका पूछा नहीं था क्या बताये किस आदमी का । जमील ने लड़खड़ाती जबान से बताया की सामने वाले घर में है वो आदमी । सिपाही ने सामने वाला घर खटखटाया अंदर से जानना बुर्के में बाहर निकली, सिपाही ने उससे पूछा ये मरा घोडा तुम्हारा है । जनाना ने पूछा कौन सा घोडा साहब, सिपाही चिल्लाया  अरे ये तुम्हारे सामने जो आठ गधे मरे हुए घोड़े को लटकाये खड़े है, दिखता नहीं क्या। अरे क्या बोल रहे हो साहब हम गरीब बकरी तो पाल नहीं सकते घोडा क्या खाक पालेंगे।  हमारा नहीं ये।  क्यू बे झूठ बोलता है ले चालू थाने सिपाही ने अर्दब दिया।  थाने  का नाम सुनते ही सभी को चक्कर  आने लगा।  कक्कू चिल्लाये अरे नहीं साहब गलती हो गई अरे खड़े क्या हो नालायको आगे बढ़ो , कक्कू ने हांक लगाई।  अब जहा जाते हँसी की आवाज आती।  सारा दिन मरे हुए घोड़े को कंधे पर लिए भूखे प्यासे घूमते रहे। जहा जाते जिस चौराहे  पर जाते आवाज आती आगे  बढ़ो जल्दी।   सबको जल्दी है।  रोजा  खोलने का वक्त हो गया है  नमाज तो पढ न पाये। काम से काम रोज तो खोल ले समय पर।  शाम के सात बजने वाले है वो आठो  नमाजी मरे हुए घोड़े को कंधे पर उठाये इधर से लेकर उधर, और इस चौराहे से लेकर उस चौराहे  तक घूम रहे है तभी रजा चिल्लाया वो देखो स्टेशन , गाड़ी की आवाज आ रही थी शायद अपने ही गाव की रेल हो।  इतना ही सुनना  था की सभी ने घोड़े को सड़क किनारे फेका और तेजी से स्टेशन की तरफ लपके।  अब कोई इस रेल को नहीं छोडना  चाहता  था।   अब उन्हें अलविदा की नमाज नहीं चाहिए उन्हें रेल  चाहिए , जो बस उनके गांव जा रही हो।  सब दौड़े ट्रैन में चढ़े बिना ये जाने  की कौन सी ट्रैन है और ना हीं टिकट लिया।  वो  थके हुए  थे हारे हुए थे। अब ये संजोग है की वो विकलांग  डिब्बे में थे।  ये डिब्बा सही था उनके लिए,  क्यू की  उनकी हालत विकलांगो से भी ज्यादा ख़राब थी।  शायद ऊपर वाले को उन पर दया आ गयी। सुबह तब आँख  जब कुली ने जगाया अरे भैया उठो  ई  प्रतापगढ़  आ गवा है और अब गाड़ी आगे  ना  जावेगी . क्या प्रतापगढ़ आ  गया।  हमार  घर आ  गवा।  सब चिल्लाये और घर की तरफ दौड़े।  सब खुस थे  क्यू की आज  ईद है और ईद तो घर पर ही होनी चाहिए।  मेरा इतना कहना था की मेरी पत्नी  जोर से खिलखिला कर हँस  पड़ी , और सच बताऊ उसकी हंसी से बढ़ कर मेरे लिए कोई  ईदी नहीं हो सकती। 

तो ईद मुबारक।


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