Thursday, 8 October 2015

उन दिनों की बात है

बात उन दिनों की है जब हाईस्कूल बस पास ही किया था और बोर्ड परीक्षाओं के भारी दबाव से उबरे थे।उम्मीदों अरमानों को ऐसे पर लगे थे कि जैसे किसी जेल की अंडासेल से सालों की सजा काट के आये कैदी को एक दम से खुले में मनमर्जी करने के लिए छोड़ दिया गया हो वो भी भरी जेब के साथ। हर रोज का एक ही शेड्यूल एक बजे तक स्कूल,पाँच बजे तक सारे ट्यूशन निपटा के हर शाम मौज मारने के लिए फ्री। अब नया जवान होता लड़का मौज कैसे मारता है सबको पता है।कटोरा कट की हेयर स्टाइल का चलन पूरे शबाब पर था।चौड़ी मोरी के बेलबाटम फिर से लौट आये थे जो नीचे से कटी शर्ट के साथ में पहन के हर लौंडा अपने को राज आर्यन मल्होत्रा समझता था और अपने नारायण शंकर की तलाश में साईकिल से पूरे शहर का चक्कर लगाता।नारायण शंकर की तलाश अनुशासन, प्रतिष्ठा, परम्परा के लिए नहीं बल्कि उनकी कन्या से इश्क फरमाने लिए होती थी। अब जब नारायण शंकर मिलेगे तब न उनकी कन्या मिलेगी।
हर हफ्ते इधर टाकीज में नई फिल्म लगी नहीं कि तीस रुपये वाला बालकनी का टिकट लेकर अन्दर हो लिए। छोटे शहरों के सिनेमाघरों में फिल्म रिलीज होने के महीने दो महीने बाद ही लगती थी।
आमदनी अठन्नी खर्चा रुपईया, अक्स,अलबेला,चोरी चोरी चुपके-चुपके, बस इतना सा ख्वाब है,चाँदनी बार,दिल चाहता है, राजू चाचा,यादें,प्यार इश्क और मोहब्बत, गदर,लगान,कसूर,एक रिश्ता, प्यार तूने क्या किया, लव के लिए कुछ भी करेगा,जोड़ी नम्बर 1, कभी खुशी कभी गम, क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता,मुझे कुछ कहना है, लज्जा, नायक,अजनबी, हमराज,RHTDM, वन 2 का 4,तुम बिन,मोहब्बतें...... और न जाने कौन कौन सी फिल्में जिनके नाम भी याद नहीं आ रहे वो सभी बैक टू बैक बिना नागा किये पूरी तल्लीनता, फुर्सत के साथ, यार दोस्तों से गप्पें हांकते हुए पापड़, कोल्ड ड्रिंक, समोसे के साथ देखीं।
अब बात आज की,चुनावों के भारी दबाव से निकल के अरमानों को वैसे ही पर लगे हैं।रोज का वही शेड्यूल, हर शाम पांच बजे रोज की नौटंकी के फुर्सत होकर मैं अपने लुच्चे दोस्तों के साथ xxl साईज की लोकलुभावन आम शर्ट पहन कर निकल पड़ता हूँ अपने नारायण शंकर की तलाश में और घुस जाते हैं किसी मल्टीप्लेक्स में।
बैंग बैंग,पीके,मसान, दृश्यम्, गब्बर इज बैक,माउन्टेन मैन और न जाने कौन कौन सी फिल्में जिनके नाम भी याद नहीं आ रहे वो सभी बैक टू बैक बिना नागा किये पूरी तल्लीनता फुर्सत के साथ गप्पें हांकते हुए देख ही लेता हूँ और सबको कहा कि जाओ तुम भी देखो,देश और दिल्ली तो चल ही रहे हैं।
बहुत बहुत आभार मेरे इस उम्र के लौंडापे को.. वो दिन फिर से याद दिलाने के लिए जो ये मान कर मैं भूल गया था कि वो वापिस कभी नहीं आयेंगें।
वाया : वही मानवेन्द्र सिंह जी heart emoti

जो जीता वही सिकंदर


वो इंग्लिश मीडियम से पढ़ी थी...मैं हिंदी मीडियम से था..हमारी दुनिया बहुत अलग अलग थी..बोलने के ढंग भी...यहां तक कि खाने के पीने के तरीके भी...वो चिप्स के पैकेट लिए घूमती थी..और यहां २ दोस्त एक समोसे को एक दौने में चटनी डाल २ चम्मचों से खाते थे.
एक दिन ट्यूशन में कॉमन बैच कर दिए गए...हम हिंदी मीडियम वालों को कह दिया गया कि अब धीरे धीरे तुम्हे भी इंग्लिश में साइंस और मैथ पढ़ना पड़ेगा. असहज होते हुए..सकुचाते हुए..अपनी एटलस साइकिल पर सवार हम भी पहुँचने लगे कॉमन बैच में. उसके क्लास्स्मेट्स हीरो पुक..और रेंजर टाइप साइकलों से आते थे..और हमारे लिए उस दौर में शर्ट बाहर निकाल के नीचे बेल बॉटम पहनना फैशन था.
उस बैच में मैं और मेरे दोस्त अलग ही छंटते थे..उनके मजाक भी अलग तरह के होते थे..और वो सब मजाक के बाद आपस में तालियाँ मारते थे..हमारा ट्यूशन में बोलना धीरे धीरे कम होता गया..और वो बिग बबूल फुला के सब समझने की एक्टिंग करते थे.
हम दोस्त चुपचाप उनको अचरज भरी निगाहों से देखते और सोचते कि हम भी इसी शहर से हैं..फिर हम इनकी तरह नए नए वीडियो गेम के कैसेट..रिकी मार्टिन के गानों की बात क्यों नहीं कर पाते..वो लोग ऑस्ट्रेलिया अफ्रीका के मैच भी देख लेते थे..और दूसरी तरफ हम दूरदर्शन के अलावा किसी और चैनल पे आने वाले मैच के बारे में या तो शाम के समाचारों में जान पाते या सुबह के अखबारों में. साला अंदर का कॉन्फिडेंस तक हिल गया था...लगता था मानो कितना पीछे रह गए हैं दुनिया से. उन लोगो की सुप्रेमेसी अलग ही झलकती थी..और वो भी उनके साथ खिलखिला के हंसती.
कभी जब हम दोनों वक़्त से पहले ट्यूशन पहुँच जाते..तो एक awkward सी ख़ामोशी हम दोनों के बीच रहती थी..मुंह से हेलो निकलने से पहले दिल की धड़कने तेज दौड़ने लगतीं..और अगले 5 मिनट यही सोचने में निकल जाते कि हाय कहें हेलो कहें..और ऐसे ही महीने बीतते गए.
हालाँकि उन लड़कों का टशन उनके बीच तक ही था..पर हम मन ही मन जानते थे कि वो हमको गंवार समझते हैं..इस अघोषित युद्ध में एक वार करने की कसक हम दोस्तों में हमेशा रहती..लेकिन वो हमसे लड़ते भी तो नहीं थे..और पहले से अटकना हमारे संस्कारों के खिलाफ था.
फिर ट्यूशन वाली मैम ने एक दिन मैथ्स का टेस्ट अनोउंस कर दिया..ट्यूशन वाली लड़की का चेहरा उतर गया..और बिग बबूल वाले लड़कों ने yey कह के गुब्बारे फुलाये..एक दुसरे के हाथ में तालियाँ मारी.
उसी दौर में हमने जो जीता वही सिकंदर भी देखी थी..हम मन ही मन उनको राजपूत कॉलेज वाले और अपने आपको मॉडल स्कूल वाले पजामा छाप समझने लगे थे..हमारे अंदर की हीनता की ग्रंथि दिन पे दिन बढ़ती जा रही थी..अब साइकिल रेस तो फिल्मों में ही होती है..और हीरोइन को इम्प्रेस करने के लिए स्टंट बाजी हमसे होनी नहीं थी..
बस फिर क्या था..हमने मैथ्स के टेस्ट को ही साइकिल रेस मान के तैयारी शुरू कर दी..मुश्किल था..क्यूंकि हिंदी मीडियम से अचानक इंग्लिश में ट्रांजिशन बहुत मुश्किल होता है..लेकिन अपना ईगो बचपन से ही अपने औकात से ज्यादा था..सारे चेप्टरों का रियाज करके..हम भी तय तारिख वाले दिन ट्यूशन पहुँच गए. अब ये टेस्ट मात्र एक टेस्ट नहीं था..ये प्रतिष्ठा का सवाल था..और उसमे आग में घी डालने का काम उन लड़कों ने हमारी तरफ मैडम से पूछते हुए कि फेल होने वालों को क्या मिलेगा पूछ के कर दिया. वो रेडीमेड स्वेटर पहन पहन बड़े अच्छे जूते और न्यूपोर्ट की जीन्स पहन के आये थे. और हम वही अपनी फेमस स्टाइल में माँ के हाथ का बुना हुआ कॉलर वाला स्वेटर पहन के पहुंचे थे.
ख़ैर तमाम घूरा घारी के साथ..30 मिनट की टाइम लिमिट के साथ एग्जाम शुरू हुआ..उनकी "ओ यस"..."ओ शिट"..."एक्सक्यूज़ मी मैम" की आवाजें आने लगी...आज वो भी उन्ही सब के बीच बैठीं थी..और अपने पैन के कैप को मुंह में दबाये इधर उधर कॉपियों में कनखियों से देख रहीं थी.
इधर हमारे लिए ये एक युद्ध था..जिसमें हमें जीतना ही जीतना था..और पिछले 4 महीने का गुबार निकालना था..और आम और डाली वाली कहावत भी एस्टाब्लिश करनी थी..हमारी कलम..और ऊँगली..एक बार शुरू हुईं तो सीधे तब ही रुकीं जब आखिरी सवाल सॉल्व कर दिया. सबसे पहले कॉपी मैंने..उसके बाद मेरे दोस्त ने जमा की..और ट्यूशन से बाहर गली में आ गए..एक दुसरे को देख के मुस्कुराये..ताली देने का रिवाज अब तक हमने नहीं सीखा था..एक दूसरे को गले से लगाया..मानो मन ही मन गा रहे हों " वो सिकंदर ही दोस्तों कहलाता है..हार बाज़ी को जीतना जिसे आता है" ..
रिजल्ट का क्या था..8 एटजा इज इक्वल टू 64 वाले कभी सत्रह सत्ते 119 वालों से जीत पाये हैं भला कभी. smile emoticon
उसके बाद फिर कभी उसे इम्प्रेस करने की कोशिश नहीं की..और न कभी ध्यान दिया कि उन बिग बबूल वालों ने क्या पहना है wink e

Tuesday, 6 October 2015

गाय


तरुण विजय के विचार -------
अगर असिया अंद्राबी किसी इस्लामी देश में एक हिंदू होतीं और उन्होंने अपने धार्मिक अधिकारों का दावा करने के लिए एक असहाय गाय का वध किया होता तो अब तक वो सुपुर्द-ए-ख़ाक हो चुकी होतीं. उन्हें अपने सितारों का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि वो एक हिंदू बाहुल्य देश में पैदा हुई थीं, जहां हिंदू संवेदनशीलता का मज़ाक और अपमान राज्य द्वारा सिर्फ सहन ही नहीं किया जाता बल्कि मीडिया के मुखर बुद्धिमान हिंदू (जिन्हें सेकुलर के नाम से जाना जाता है), उनके द्वारा बढ़ावा भी दिया जाता है.     
हम जैसे लोगों के बार में सोचो जिन्हें गाय को मां की तरह पूजा करने के लिए बड़ा किया गया है, जो हिंदू नेताओं और धर्म प्रचारकों द्वारा लगातार सुनते आ रहे हैं कि गाय की हत्या पाप है, जिन्हें बताया गया कि शिवाजी ने कभी गाय की हत्या को बर्दाश्त नहीं किया और जिस कसाई ने ऐसा किया उसे मौत के घाट उतार दिया गया. आज उन्होंने हमें उस मां को ऐसे चुपचाप देखने के लिए मजबूर कर दिया जैसा कभी सोचा भी नहीं था.
कुछ लोग बाजार में हाथ में चाकू लिए और मरे हुए जानवर से खून रिसता देखकर अपने मांस खाने की आदत का प्रदर्शन करते हैं. और इस कृत्य को सही और वैध माना जाता है जिसे एक सैकुलर राष्ट्र के सैकुलर मीडिया द्वारा स्वीकार भी कर लिया जाता है.
हमने ऐसी घटनाओं के बारे में तब ही सुना है जब किसी हमलावर ने लोगों को सबक सिखाना चाह हो. हमने सुना है कि जब एक मुस्‍ल‍िम हमलावर ने हमें नीचा दिखाना चाहा तब उसने अमृतसर के हरमंदिर साहिब के पवित्र तालाब को गाय के रक्त से भर दिया था. हर किसी ने इसकी निंदा की थी और अब ये हमारी यादों मे एक दुखद और निंदनीय कृत्य के रूप में अंकित है. महाराजा रणजीत सिंह ने भी गाय के वध पर प्रतिबंध लगा दिया था और सारे सिख गुरुओं ने इसे पवित्र माना.
राजनीतिक स्वार्थ के चलते आज सिख भी इस मुद्दे पर चुप हैं, यहां तक कि पंजाब में तो गठबंधन की सरकार है. हमारे इतिहास के हर युग में हिंदुओं के खिलाफ खड़े हिंदुओं की कीमत हमारे समाज को एक सोमनाथ से चुकानी पड़ी है. इस उम्मीद पर कि कसाइयों को एक दिन दया आएगी, इन हत्याओं पर चुप्पी का नतीजा ये हुआ कि बहुसंख्या में होने के बावजूद भी हम अपने ही देश में शरणार्थी बनते जा रहे हैं.
ये बहुत आश्चर्य की बात है कि आजादी मिलने के बाद से हिंदुओं ने अपने हमलावरों के साथ विनम्र होकर जीना सीख लिया है. पड़ोसियों द्वारा जनसंख्या आक्रमण, श्रीनगर में भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष के आखिरी भुला दिए गए दिन, विश्व की पहली और सबसे श्रद्धेय पुस्तक ऋग्वेद का अपमान, हिंदू सन्यासियों के मूर्ख और पुराने कबाड़ की तरह कार्टून बनाना, हिंदू संगठनों का कम पढ़े-लिखे, महिला विरोधी, अल्पसंख्यक विरोधी के रूप में प्रदर्शित करना- ये सब आज के फैशनेबल और रईस समाज का चलन हो गया है, जहां लोग अक्सर सत्ता के संभ्रांत लोगों के करीबी दिखाई देते हैं, फिर चाहे उनका रंग और विश्वास कुछ भी हो.
हम हालिया इतिहास भूल गए हैं जब हिंदू मंदिरों को लूटा गया और उनके देवी देवताओं के चित्रों को जला दिया गया था, जबकि धर्मनिर्पेक्षों ने इस बात से मुंह मोड़ लिया था.
जब एक बुजुर्ग लक्ष्‍मणानंद सरस्वती दूसरे धर्म को मानने वाले विमुख हिसंक समूहों द्वारा हमेशा के लिए शांत कर दिए गए थे. ऐसी घटनाएं कभी भी सार्वजनिक बहस का मुद्दा नहीं बनीं. बल्कि इन घटनाओं को हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा झूठी और मनगढ़ंत कहानियां बताया गया. जब एक संगीतकार सूफियाना विषय पर काम करता है, तब वो एक हीरो है पर जब उसे मौलानाओं द्वारा धमकी मिलती है तो ये धर्मनिर्पेक्ष लोग चुप्पी साध लेते हैं. 
कुछ लोगों ने हिंदुओं द्वारा सहे गए हमलों पर कुछ किताबें भी लिखीं, हांलाकि क्षमा याचना के साथ जैसे कि हम साउदी देश में हों, और सताए गए हिंदू इस कदर अधिकारहीन कर दिए गए कि ऐसे साहित्य केवल कुछ ही मुखर लोगों तक सीमित रहे, जिन्हें कभी किसी धर्मनिर्पेक्ष पत्रिकाओं के पन्नों पर अंकित नहीं किया गया. उन्हें अपना घर बार, गीत और त्यौहार छोड़ने के लिए मजबूर किया गया- उन्हें मरने के लिए मजबूर किया गया और एक पूरी पीढ़ी ने अपनी जमीन और अपनेपन की भावना को त्याग दिया. उनके दुख को देश का मुद्दा बनाने के लिए कुछ नहीं किया गया. विमान दुर्घटना के पीड़ित या प्रकृतिक आपदाओं के शिकार हुए लोगों की तरह किसी को मुआवजा मिल गया, किसी को कुछ राहत सामग्री, किसी को अनुकंपा के आधार पर स्कूल और कॉलेजों में दाखला मिल गया. लेकिन जीवन हमेशा की तरह सामान्य ही रहा. राष्ट्र दूसरे मुद्दों पर व्यस्त रहा जैसे- चुनाव, विघटन, फिर से चुनाव और फिर एक नई सरकार का बनना, आतंकी हमले, बम विस्फोट और फिर से आतंकवाद को खत्म करने की शपथ. अब ये एक रुटीन एक्सरसाइज है.   
कुछ लोगों ने सोचा कि घाटी में गद्दार हैं जो पाकिस्तानी उच्चायुक्त से मिलने के लिए इकट्ठा हुए. एक और विभाजन चाहने वालों के लिए ये एक दूसरे तरह की जियारत थी.
फिरभी कुछ लोग सोचते हैं कि वो प्रतिष्ठित राजनीतिक सत्याग्रही हैं. उन्हें यात्रा करने के लिए पूरा सरकारी फंड मिलता है, उनके लिए मजबूत सुरक्षा का बंदोबस्त किया जाता है और देशभक्त भारतीय करदाताओं की बदौलत नियमित स्वास्थ्य जांच भी होती है.
कश्मीर में लाल चौक पर खुले आम गोजातीय जानवरों की हत्याओं की मांग का, गाय के मांस के स्वाद से या फिर कुरान या शरियत में नहीं लिखे धार्मिक आदेशों से कोई लेना देना नहीं है. ईद के दौरान गौमांस के उत्सव का उद्देश्य निसंदेह भारतीय सरकार को परेशान करना और चोट पहुंचाना है और दिल्ली में बैठे सत्ताधारियों को ये संदेश देना है कि- देखो, हम तुम्हारी सरकार को खुले तौर पर चुनौती दे रहे हैं और उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना कर रहे हैं. जो चाहे कर लो.
भारत में चुनौती के रूप में और वाहवाही के लिए सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए गौमांस खाना, राम जन्म भूमि पर मंदिर को नष्ट करने जैसा है, जिसका उद्देश्य वशीभूत हिंदुओं का अपमान कर उनकी जगह दिखाना है. ये एक राजनीतिक कृत्य है जिसका पाक कला और धर्म से कोई लेना देना नहीं है.  
असिया अंद्राबी के घृणित बयान पर हिंदू संगठनों और प्रचारकों की चुप्पी का कारण शांति बनाए रखने की कोई महान इच्छा है. हिंदुओं को जिहादियों के साथ शांति बनाने के लिए घाटी छोड़ देना चाहिए. उन्हें अपनी मां को खुल आम कत्ल के लिए छोड़ देना चाहिए क्योंकि इससे शांति बनी रहेगी. हिंदुओं को इस बात कि मांग नहीं रखनी चाहिए कि घाटी के स्कूलों में राष्ट्रगान गाया जाए और उनके पास एक बड़ी जिम्मेदारी है और हमलावरों को भड़काने के लिए उन्हें जरा सा भी मौका नहीं देना चाहिए. शक्तिशाली नियम बनाते हैं. जैसा कि हमने चेन्नई एक्सप्रेस में देखा था, स्टेशन वही होता था जहां गुंडों को उतरना होता था. ऋग्वैदिक काल में बेगुनाह महिलाओं के सटीक चित्रण पर मीडिया मुगलों ने कैसा मजाक बनाया था. धर्मनिर्पेक्ष बुद्धिजीवी आरएसएस के बयानों पर झपटते हैं. ये वो हैं जिन्हे 'सब पता है' जिन्होंने सारे वेद, उपनिषद, पुराण सब पढ़े हैं. वो सोचते हैं कि भारतीय संस्कृति के बारे में जो कोई भी अच्छा बोलता है, उसका जोरदार विरोध करना चाहिए और अपमान करना चाहिए जैसा कि अंग्रेजों के समय होता था. वो गार्गी, मैत्रेयी, विद्रोही जानकी, नचिकेता की माता को जानते हैं, जिन्होंने मृत्यु के देवता को चुनौती दी थी. वो दुर्गा और अंदल के सर्वनाश के बारे में भी जानते हैं- जो मंगल और शुक्र से पृथ्वी पर उतरे थे. उनका इस देश के लोकाचार और संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है.
तो जैसा कि हम आज देखते हैं, आईएसआईएस के क्रूर पिता औरंगजेब को बचाया जाना चाहिए. एक उभरते राष्ट्र के एक राष्ट्रवादी आईकॉन, हमारे प्रधानमंत्री का भी आज के मीर जाफर की तरह विदेशी धरती पर विरोध किया जाना चाहिए. वामपंथी लेखकों के खिलाफ निंदनीय कृत्यों का दोष छानबीन से पहले ही हिंदू संगठनों को दिया जाना चाहिए.
इस देश में कोई भी ऐसा अखबार नहीं बचा जो उन विचारों को प्रकाशित करने को राजी हो जो उनके खुद के विचारों से मेल नहीं खाते.
एक राष्ट्र सड़कों और बिजली की लाइनों से नहीं बनता. सोवियत संघ को याद करें. ये एक राष्ट्र की मूल आदर्श हैं जिनकी सुरक्षा की जानी चाहिए-  भारत के लिए इसका मतलब है कि हम सारे नागरिकों की संवंदनशीलता का सम्मान करें और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करें चाहे वो कितने ही छोटे क्यों न हों.
सबसे चौंकाने वाली बात तो तथाकथित उदार, धर्मनिर्पेक्ष मुस्लिम बुद्धिजीवियों की चुप्पी है, जिन्होंने सिर्फ अपनी काबिलियत और प्रतिभा की वजह से प्रगति नहीं की है बल्कि इसलिए भी कि हिंदुओं ने उन्हें सहारा दिया.

Monday, 5 October 2015

बाल कविता

एक बार की बात थी
                            तब शायद रात थी ।
मै  सोया था जंगल में
                               शायद तब मंगल था ।
मेरे सामने आया शेर
                              ड़र  से मैं  हो गया ढेर ।
थर थर लगा कांपने
                            ड़र से लगा मै हांफने ।
मै बोला जाने दो मुझको'
                                  मुझको घर   दो ।
शेर बोला ना जाने दूंगा
                                कच्चा तुझे चबा जाऊंगा ।
हाथ जोड़ कर बोला मै
                                मुझको घर जाने दो ।
झट से गिरा पलंग के नीचे
                                     रोते रोते  खोली आँख    ।
अरे ये तो सपना था
                            ऐसा सपना अब  ना आना ।
अब ना आना
                   कभी ना आना ।  

Sunday, 4 October 2015

सब लोग हिंदी को प्रोत्साहित कर रहे हैं तो मुझे भी आज हिंदी बोलने का शौक हुआ, घर से निकला और एक ऑटो वाले से पूछा,
"त्री चक्रीय चालक, पूरे सुभाष नगर के परिभ्रमण में कितनी मुद्रायें व्यय होंगी?"

ऑटो वाले ने घूर कर मेरी तरफ देखा और बोला,"अबे हिंदी में बोल।"

मैंने कहा, "श्रीमान मै हिंदी में ही वार्तालाप कर रहा हूँ।"

ऑटो वाले ने कहा, "मोदी जी पागल करके ही मानेंगे। चलो बैठो, कहाँ चलोगे?"

मैंने कहा, "परिसदन चलो।"

ऑटो वाला फिर चकराया, "अब ये परिसदन क्या है?"

बगल वाले श्रीमान ने कहा, "अरे सर्किट हाउस जाएगा"

ऑटो वाले ने सिर खुजाया और बोला, "बैठिये प्रभु।"

रास्ते में मैंने पूछा, "इस नगर में कितने छवि गृह हैं?"

ऑटो वाले ने कहा, "छवि गृह मतलब?"

मैंने कहा, "चलचित्र मंदिर।"

उसने कहा, "यहाँ बहुत मंदिर हैं... राम मंदिर, हनुमान मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, शिव मंदिर।"

मैंने कहा, "भाई मैं तो चलचित्र मंदिर की बात कर रहा हूँ। जिसमें नायक तथा नायिका प्रेमालाप करते हैं।"

ऑटो वाला फिर चकराया, "ये चलचित्र मंदिर क्या होता है?"

यही सोचते सोचते उसने सामने वाली गाडी में टक्कर मार दी। ऑटो का अगला चक्का टेढ़ा हो गया।

मैंने कहा, "त्री चक्रीय चालक तुम्हारा अग्र चक्र तो वक्र हो गया।"

ऑटो वाले ने मुझे घूर कर देखा और बोला, "उतर जल्दी उतर।"

सामने पंक्चर की दुकान थी मैंने दुकान वाले से कहा, "हे त्रिचक्र वाहिनी सुधारक महोदय, कृप्या अपने वायु ठूंसक यंत्र से इनके त्रिचक्र वाहिनी के द्वितीय चक्र में वायु ठूंस दीजिये।"

दूकानदार ने घूरकर मुझे देखा और बोला, "चल भाग यहाँ से कमीने, एक तो सुबह से बोनी नहीं हुई और तू शलोक सुना रहा है।"

तब से यही सोच रहा हूँ कि अब क्या करूँ हिंदी का?
इंसान की समझ बस इतनी है।
जब जानवर कहा जाये तो नाराज़ हो जाता है और जब शेर कहा जाये खुश हो जाता है।
हालाँकि शायद शेर भी जानवर ही होता है।
आज खबर पढ़ी कि चेन्नई में स्कूल टीचर ने स्टूडेंट को थप्पड़ मारा तो उसे 50,000/- रुपए का भुगतान करना पड़ा।
साला अगर हमारे स्कूल वाले ज़माने में ऐसा रिवाज़ होता तो मेरे साथ हुई पिटाई के बदले में मेरे पास भी आज 4-5 फ्लैट होते। 2-4 बड़ी गाड़ियाँ, फार्म हाउस और स्विस बैंक में मेरा खुद का खाता होता।