वो इंग्लिश मीडियम से पढ़ी थी...मैं हिंदी मीडियम से था..हमारी दुनिया बहुत अलग अलग थी..बोलने के ढंग भी...यहां तक कि खाने के पीने के तरीके भी...वो चिप्स के पैकेट लिए घूमती थी..और यहां २ दोस्त एक समोसे को एक दौने में चटनी डाल २ चम्मचों से खाते थे.
एक दिन ट्यूशन में कॉमन बैच कर दिए गए...हम हिंदी मीडियम वालों को कह दिया गया कि अब धीरे धीरे तुम्हे भी इंग्लिश में साइंस और मैथ पढ़ना पड़ेगा. असहज होते हुए..सकुचाते हुए..अपनी एटलस साइकिल पर सवार हम भी पहुँचने लगे कॉमन बैच में. उसके क्लास्स्मेट्स हीरो पुक..और रेंजर टाइप साइकलों से आते थे..और हमारे लिए उस दौर में शर्ट बाहर निकाल के नीचे बेल बॉटम पहनना फैशन था.
उस बैच में मैं और मेरे दोस्त अलग ही छंटते थे..उनके मजाक भी अलग तरह के होते थे..और वो सब मजाक के बाद आपस में तालियाँ मारते थे..हमारा ट्यूशन में बोलना धीरे धीरे कम होता गया..और वो बिग बबूल फुला के सब समझने की एक्टिंग करते थे.
हम दोस्त चुपचाप उनको अचरज भरी निगाहों से देखते और सोचते कि हम भी इसी शहर से हैं..फिर हम इनकी तरह नए नए वीडियो गेम के कैसेट..रिकी मार्टिन के गानों की बात क्यों नहीं कर पाते..वो लोग ऑस्ट्रेलिया अफ्रीका के मैच भी देख लेते थे..और दूसरी तरफ हम दूरदर्शन के अलावा किसी और चैनल पे आने वाले मैच के बारे में या तो शाम के समाचारों में जान पाते या सुबह के अखबारों में. साला अंदर का कॉन्फिडेंस तक हिल गया था...लगता था मानो कितना पीछे रह गए हैं दुनिया से. उन लोगो की सुप्रेमेसी अलग ही झलकती थी..और वो भी उनके साथ खिलखिला के हंसती.
कभी जब हम दोनों वक़्त से पहले ट्यूशन पहुँच जाते..तो एक awkward सी ख़ामोशी हम दोनों के बीच रहती थी..मुंह से हेलो निकलने से पहले दिल की धड़कने तेज दौड़ने लगतीं..और अगले 5 मिनट यही सोचने में निकल जाते कि हाय कहें हेलो कहें..और ऐसे ही महीने बीतते गए.
हालाँकि उन लड़कों का टशन उनके बीच तक ही था..पर हम मन ही मन जानते थे कि वो हमको गंवार समझते हैं..इस अघोषित युद्ध में एक वार करने की कसक हम दोस्तों में हमेशा रहती..लेकिन वो हमसे लड़ते भी तो नहीं थे..और पहले से अटकना हमारे संस्कारों के खिलाफ था.
फिर ट्यूशन वाली मैम ने एक दिन मैथ्स का टेस्ट अनोउंस कर दिया..ट्यूशन वाली लड़की का चेहरा उतर गया..और बिग बबूल वाले लड़कों ने yey कह के गुब्बारे फुलाये..एक दुसरे के हाथ में तालियाँ मारी.
उसी दौर में हमने जो जीता वही सिकंदर भी देखी थी..हम मन ही मन उनको राजपूत कॉलेज वाले और अपने आपको मॉडल स्कूल वाले पजामा छाप समझने लगे थे..हमारे अंदर की हीनता की ग्रंथि दिन पे दिन बढ़ती जा रही थी..अब साइकिल रेस तो फिल्मों में ही होती है..और हीरोइन को इम्प्रेस करने के लिए स्टंट बाजी हमसे होनी नहीं थी..
बस फिर क्या था..हमने मैथ्स के टेस्ट को ही साइकिल रेस मान के तैयारी शुरू कर दी..मुश्किल था..क्यूंकि हिंदी मीडियम से अचानक इंग्लिश में ट्रांजिशन बहुत मुश्किल होता है..लेकिन अपना ईगो बचपन से ही अपने औकात से ज्यादा था..सारे चेप्टरों का रियाज करके..हम भी तय तारिख वाले दिन ट्यूशन पहुँच गए. अब ये टेस्ट मात्र एक टेस्ट नहीं था..ये प्रतिष्ठा का सवाल था..और उसमे आग में घी डालने का काम उन लड़कों ने हमारी तरफ मैडम से पूछते हुए कि फेल होने वालों को क्या मिलेगा पूछ के कर दिया. वो रेडीमेड स्वेटर पहन पहन बड़े अच्छे जूते और न्यूपोर्ट की जीन्स पहन के आये थे. और हम वही अपनी फेमस स्टाइल में माँ के हाथ का बुना हुआ कॉलर वाला स्वेटर पहन के पहुंचे थे.
ख़ैर तमाम घूरा घारी के साथ..30 मिनट की टाइम लिमिट के साथ एग्जाम शुरू हुआ..उनकी "ओ यस"..."ओ शिट"..."एक्सक्यूज़ मी मैम" की आवाजें आने लगी...आज वो भी उन्ही सब के बीच बैठीं थी..और अपने पैन के कैप को मुंह में दबाये इधर उधर कॉपियों में कनखियों से देख रहीं थी.
इधर हमारे लिए ये एक युद्ध था..जिसमें हमें जीतना ही जीतना था..और पिछले 4 महीने का गुबार निकालना था..और आम और डाली वाली कहावत भी एस्टाब्लिश करनी थी..हमारी कलम..और ऊँगली..एक बार शुरू हुईं तो सीधे तब ही रुकीं जब आखिरी सवाल सॉल्व कर दिया. सबसे पहले कॉपी मैंने..उसके बाद मेरे दोस्त ने जमा की..और ट्यूशन से बाहर गली में आ गए..एक दुसरे को देख के मुस्कुराये..ताली देने का रिवाज अब तक हमने नहीं सीखा था..एक दूसरे को गले से लगाया..मानो मन ही मन गा रहे हों " वो सिकंदर ही दोस्तों कहलाता है..हार बाज़ी को जीतना जिसे आता है" ..
रिजल्ट का क्या था..8 एटजा इज इक्वल टू 64 वाले कभी सत्रह सत्ते 119 वालों से जीत पाये हैं भला कभी. smile emoticon
उसके बाद फिर कभी उसे इम्प्रेस करने की कोशिश नहीं की..और न कभी ध्यान दिया कि उन बिग बबूल वालों ने क्या पहना है wink e
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