Thursday, 8 October 2015

उन दिनों की बात है

बात उन दिनों की है जब हाईस्कूल बस पास ही किया था और बोर्ड परीक्षाओं के भारी दबाव से उबरे थे।उम्मीदों अरमानों को ऐसे पर लगे थे कि जैसे किसी जेल की अंडासेल से सालों की सजा काट के आये कैदी को एक दम से खुले में मनमर्जी करने के लिए छोड़ दिया गया हो वो भी भरी जेब के साथ। हर रोज का एक ही शेड्यूल एक बजे तक स्कूल,पाँच बजे तक सारे ट्यूशन निपटा के हर शाम मौज मारने के लिए फ्री। अब नया जवान होता लड़का मौज कैसे मारता है सबको पता है।कटोरा कट की हेयर स्टाइल का चलन पूरे शबाब पर था।चौड़ी मोरी के बेलबाटम फिर से लौट आये थे जो नीचे से कटी शर्ट के साथ में पहन के हर लौंडा अपने को राज आर्यन मल्होत्रा समझता था और अपने नारायण शंकर की तलाश में साईकिल से पूरे शहर का चक्कर लगाता।नारायण शंकर की तलाश अनुशासन, प्रतिष्ठा, परम्परा के लिए नहीं बल्कि उनकी कन्या से इश्क फरमाने लिए होती थी। अब जब नारायण शंकर मिलेगे तब न उनकी कन्या मिलेगी।
हर हफ्ते इधर टाकीज में नई फिल्म लगी नहीं कि तीस रुपये वाला बालकनी का टिकट लेकर अन्दर हो लिए। छोटे शहरों के सिनेमाघरों में फिल्म रिलीज होने के महीने दो महीने बाद ही लगती थी।
आमदनी अठन्नी खर्चा रुपईया, अक्स,अलबेला,चोरी चोरी चुपके-चुपके, बस इतना सा ख्वाब है,चाँदनी बार,दिल चाहता है, राजू चाचा,यादें,प्यार इश्क और मोहब्बत, गदर,लगान,कसूर,एक रिश्ता, प्यार तूने क्या किया, लव के लिए कुछ भी करेगा,जोड़ी नम्बर 1, कभी खुशी कभी गम, क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता,मुझे कुछ कहना है, लज्जा, नायक,अजनबी, हमराज,RHTDM, वन 2 का 4,तुम बिन,मोहब्बतें...... और न जाने कौन कौन सी फिल्में जिनके नाम भी याद नहीं आ रहे वो सभी बैक टू बैक बिना नागा किये पूरी तल्लीनता, फुर्सत के साथ, यार दोस्तों से गप्पें हांकते हुए पापड़, कोल्ड ड्रिंक, समोसे के साथ देखीं।
अब बात आज की,चुनावों के भारी दबाव से निकल के अरमानों को वैसे ही पर लगे हैं।रोज का वही शेड्यूल, हर शाम पांच बजे रोज की नौटंकी के फुर्सत होकर मैं अपने लुच्चे दोस्तों के साथ xxl साईज की लोकलुभावन आम शर्ट पहन कर निकल पड़ता हूँ अपने नारायण शंकर की तलाश में और घुस जाते हैं किसी मल्टीप्लेक्स में।
बैंग बैंग,पीके,मसान, दृश्यम्, गब्बर इज बैक,माउन्टेन मैन और न जाने कौन कौन सी फिल्में जिनके नाम भी याद नहीं आ रहे वो सभी बैक टू बैक बिना नागा किये पूरी तल्लीनता फुर्सत के साथ गप्पें हांकते हुए देख ही लेता हूँ और सबको कहा कि जाओ तुम भी देखो,देश और दिल्ली तो चल ही रहे हैं।
बहुत बहुत आभार मेरे इस उम्र के लौंडापे को.. वो दिन फिर से याद दिलाने के लिए जो ये मान कर मैं भूल गया था कि वो वापिस कभी नहीं आयेंगें।
वाया : वही मानवेन्द्र सिंह जी heart emoti

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