Wednesday, 8 July 2015

दुष्यंत कुमार जी की नजर से तो देखो जरा असमान अभी भी काले है

 इस बारिश के मौसम में महा कवि दुष्यंत कुमार जी की एक कविता प्रस्तुत है

बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं,
और नदियों के किनारे घर बने हैं ।

चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर,
इन दरख्तों के बहुत नाजुक तने हैं ।

इस तरह टूटे हुए चेहरे नहीं हैं,
जिस तरह टूटे हुए ये आइने हैं ।

आपके कालीन देखेंगे किसी दिन,
इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं ।

जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में,
हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं ।

अब तड़पती-सी गजल कोई सुनाए,
हमसफर ऊँघे हुए हैं, अनमने हैं ।

 इस कविता की खास बात ये है की इस कविता में कवि ने बारिश में होने वाले प्रेम अनुराग का चित्रण करने की बजाय बारिश में होने वाली त्रासदी को दर्शाया है ये त्रासदी बिहार की  है , उत्तरप्रदेश की है उत्तराखंड की है और ना जाने कितने प्रदेशो की है जो आजादी के 65 सालो के बाद भी नहीं सुधरी । समस्या ये नहीं की बारिश ज्यादा हो रही है या कम  हो रहगी है समस्या ये है की इतने दिनों बाद भी कोई इस में सुधर नहीं चाहता सरकार तो वैसे भी नालायक होती है उसे तो तब ही याद आती है जब पानी सर के ऊपर हो जाता है लेकिन आम आदमी तो इस में सुधर, बचाव की गुंजाइस कर सकता है । पेड़ लगा सकता है, बाढ में बचने की तैयारी  कर सकता है । खुद एवं दुसरो को बचने के उपाय कर सकता है । सिर्फ सरकार एवं अफसर के भरोसे रहेंगे तो आपके हाथो से सिर्फ जान जाएगी । बारिश आ रही है, आ  चुकी है हो सकता है की ये बारिश खेतो के लिए कम  हो लेकिन बाढ़ के लिए बहुत ज्यादा है खुद सुरक्षित रहिये एवं दुसरो को भी सुरक्षित कीजिये ।

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