जनता दल युनाइटेड के एक नेताजी हैं। अली अनवर नाम है सर का। बहुत ही संवेदनशील इंसान हैं। संवेदनशील इसलिए हैं क्योंकि वो हवा की रुख से अलग भी अपनी बात रखने की कुव्वत रखते हैं। जब देश इशरत जहां को आतंकवादी कह रहा था तब इन्होंने किसी बहस की परवाह किये बिना उसे बिहार की बेटी बताया था। आज इनसे मीडिया की बातचीत हुई और इन्होंने अपने अंदाज़ में स्मृति पर कह दिया कि – उनको भी कोई खराब विभाग थोड़े न मिला है, तन ढकने वाला विभाग मिला है। इस टिप्पणी के साथ उनकी कुटिल मुस्कान ने बता दिया कि वो कितनी तमीज़ और इज़्ज़त के साथ ये बात कहना चाह रहे थे। हमारे गली-सड़क-मोहल्ले से लेकर राजनीतिक गलियारों तक में औरतों को कब कैसे कितनी इज़्ज़त देनी है, ये लोग खुद-ब-खुद तय कर लेते हैं। महिलाओं को बदन और कपड़े से उठकर देख पाना अब भी हमेशा संभव नहीं हो पाता।
अली अनवर ने इशरत को बिटिया बता दिया क्योंकि ये उनकी पार्टी और राजनीति के हक में था। फिर अनवर साहब ने स्मृति के लिए ‘तन ढंकने वाला मंत्रालय’ कहा क्योंकि ये भी उनकी पार्टी और राजनीति के पक्ष में था। इशरत जहां का वोट बैंक की तरह इस्तेमाल हो सकता है, स्मृति ईरानी से इन्हें कुछ भी नहीं मिल सकता। इस बीच एक औरत की अस्मिता कुचली जाती है, बचा रह जाता है उसका तन-बदन-जिस्म और कपड़ा। जिस मुस्कुराहट के साथ अली अनवर ने यह टिप्पणी की, वैसी मुस्कान के साथ गली-चौराहे पर खड़े आवारे लड़के लड़कियों पर तंज कसते हैं तो लड़कियां पलटकर जवाब नहीं देतीं, सिर घुमाकर चली जाती हैं। उनकी मां ने सिखाया होता है कि ऐसी बातें इग्नोर करनी हैं। इससे उन लड़कों का मनोबल बढ़ता है और उनकी वो घटिया मुस्कान बनी रहती है।
ऐसी टिप्पणी की जब आदत पड़ जाती है तो इंसान न चाहते हुए भी अपना कद और पद भूल जाता है और वो संसद पहुंचकर भी वही चौराहे वाला लड़का बना रहता है। अली अनवर से शायद स्मृति कुछ न पूछें लेकिन मैं ज़रूर जानना चाहूंगी कि इशरत को बेटी कहने वाले के लिए स्मृति क्या हैं? एक सहकर्मी को तन-बदन से ऊपर उठकर कब देखा जा सकेगा? औरतों के लिए ऐसे घटिया शब्द और टिप्पणियां कबतक मज़ाक बने रहेंगे? ऐसे शब्दों से कहां तक रसास्वादन किया जा सकेगा?