Tuesday, 19 April 2016

क्रन्तिकारी

ट्वीटर, फेसबुक और व्हाट्सएप अपने प्रचंण्ड क्रांतिकारी दौर से गुजर रहा है। हर नौसिखीया क्रांति करना चाहता है। कोई बेडरूम में लेटे-लेटे गौ-हत्या करने वालों को सबक सिखाने की बातें कर रहा है तो किसी के इरादे सोफे पर बैठे बैठे महंगाई, बेरोजगारी या बांग्लादेशियों को उखाड़ फेंकने के हो रहे हैं।
हफ्ते में एक दिन नहाने वाले लोग स्वच्छता अभियान की खिलाफत और समर्थन कर रहे हैं। अपने बिस्तर से उठकर एक गिलास पानी लेने पर नोबेल पुरस्कार की उम्मीद रखने वाले बता रहे हैं कि माँ-बाप की सेवा कैसे करनी चाहिए।
जिन्होंने आज तक बचपन में कंचे तक नहीं जीते वह बता रहे हैं कि भारत रत्न किसे मिलना चाहिये।
जिन्हें गली क्रिकेट में इसी शर्त पर खिलाया जाता था कि बॉल कोई भी मारे पर अगर नाली में गई तो निकालना तुझे ही पड़ेगा वो आज कोहली को समझाते पाए जायेंगे कि उसे कैसे खेलना है।
देश में महिलाओं की कम जनसंख्या को देखते हुए उन्होंने नकली ID बनाकर जनसंख्या को बराबर कर दिया है।
जिन्हें यह तक नहीं पता कि हुमायूं, बाबर का कौन था वह आज बता रहे हैं कि किसने कितनों को काटा था।
कुछ दिन भर शायरियां पेलेंगे जैसे 'गालिब' के असली उस्ताद तो यहीं बैठे हैं।
जो नौजवान एक बाल तोड़ हो जाने पर रो-रो कर पूरे मोहल्ले में हल्ला मचा देते हैं, वे देश के लिए सिर कटा लेने की बात करते दिखेंगे।
किसी भी पार्टी का समर्थक होने में समस्या यह है कि भाजपा समर्थक को अंधभक्त, आप समर्थक उल्लू, तथा कांग्रेस समर्थक बेरोजगार करार दे दिये जाते हैं।
कॉपी पेस्ट करने वालों के तो कहने ही क्या। किसी की भी पोस्ट चेप कर ऐसे व्यवहार करेंगे जैसे साहित्य की गंगा उसके घर से ही बहती है और वो भी 'अवश्य पढ़ें' तथा 'मार्केट में नया है' की सूचना के साथ।
एक कप दूध पी लें तो दस्त लग जाए ऐसे लोग हेल्थ की टिप दिए जा रहे हैं लेकिन समाज के असली जिम्मेदार नागरिक हैं।
टैगिये... इन्हें ऐसा लगता है कि जब तक ये गुड मॉर्निंग वाले पोस्ट पर टैग नहीं करेंगे तब तक लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि सुबह हो चुकी है।
जिनकी वजह से शादियों में गुलाब जामुन वाले स्टॉल पर एक आदमी खड़ा रखना जरूरी है वो आम बजट पर टिप्पणी करते हुए पाये जाते हैं।
कॉकरोच देख कर चिल्लाते हुये दस किलोमीटर तक भागने वाले पाकिस्तान को धमका रहे होते हैं कि "अब भी वक्त है सुधर जाओ"।
क्या वक्त आ गया है वाकई। धन्य है व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्वीटर युग के क्रांतिकारी।

Friday, 15 April 2016

मै और मेरा कैरियर ना मै तुम्हे समझा पाया ना तुम मुझे समझा पाये |

कैरियर के झूठ के कितने रूप हैं..
हम कितने झूठ अपने आप से बोलते हैं.. कभी गिनती नहीं होती
क्या 12वी के बाद जो करियर हमने चुने वो हमारी अपनी मर्ज़ी से थे..
खुशकिस्मत रहे वो जिन्हे गाइड करने वाले थे..
एवरेज मार्क्स के बाद एंटरेंस में फेल होने के बाद..
कोचिंगों के तीरथ इलाहबाद भेजे गए.
जैसे तैसे साल कटा..
और फिर एंटरेंस में फेल हुए..
जो पास हुए थे उनके फोटो अख़बारों में छपे..
जो क्वालीफाई नहीं कर पाये उन्हें उनके हाल पे छोड़ दिया गया. उनमे मै भी था .
लेकिन जस्ट बिकॉज़ सोशल स्टेटस मेंटेन करना था..
तो एडमिशन भी हो गया..कुकुरमुत्तों की तरह उग आये मैनेजमेंट के  कॉलेजों में..
जैसे तैसे पास हुए ..और स्किल के नाम पे "अंग्रेजी गाने सुनना" और कुछ हॉलीवुड फिल्मों के नाम भी याद हो गए..
दिमाग में चढ़ी धुंध में सपने और भी धुंधले होते गए..
कंपनियां कब आई कब चली गयी किसको लेके गईं कुछ पता नहीं चला..
जिनके प्लेसमेंट हुए उन्होंने कॉर्पोरेट प्रोफेशनल, MNC वर्ल्ड जैसी कम्युनिटी ज्वाइन कर लीं ऑरकुट पे.
और बाकी की हिम्मत नहीं हुई कॉलेज के बाद घर लौटने की.उनमे मै भी था .
ऑफ कैंपस इंटरव्यू की तैयारी के नाम पे ट्विन शेयरिंग से..4 लोगों के साथ कमरा शेयर करने के हालात बन गए थे ..
और 5 - 6 महीने इधर उधर के दोस्तों..दोस्तों के बड़े भाइयों को रिज्यूमे भेज भेज के दिन बीतने के साथ और उदासी में डूबता गया ..
फिर जैसे तैसे साल भर के गैप के बाद एक नौकरी मिली..परिवार मै सभी खुस थे जैसे बेटे ने नोबल जीता हो | शायद हाँ नोबल ही तो, बड़ी डिग्री लेने के बाद अगर  आप कोई नौकरी ढूड ले तो वो किसी नोबल से कम तो नहीं है |
मै अपने आप पे खूब इतराया  कि बिना जुगाड़ के प्योर अपने दम पे तुम्हे नौकरी मिली है..
उस रात मैंने  गाने सुने उस पूरी रात और गाया "यहां के हम सिकंदर"..
अब मै खुश हो चूका हूँ ..और ऑरकुट के अलावा अब फेसबुक भी आ गया हूँ ..
अपने ऑफर लेटर की स्कैन कॉपी मैने  डाली फेसबुक पे सैलरी छिपा के..
और टैग किया उन सभी दोस्तों को जो ऑन कैंपस में मुझ से जीते थे और जीते थे कम्पटीशन की तैयारी में..
अब मुझे लगता है मै उनकी लीग में आ चुका हूँ ..
पर मै मन ही मन जानता था ..
कि इस तनख्वाह में भी मै ट्विन शेयरिंग का रूम भी बमुश्किल अफोर्ड कर पाउँगा..
और खायेंगे  २० रुपये पर प्लेट मिलने वाला खाना सड़क किनारे लगने वाली ठेल से..
मै अंदर ही अंदर अब भी श्योर नहीं था..
मै कहीं न कहीं जानता था ..
कि ये कांच की बिल्डिंग धोखा है..
जहां पहले दिन मुझे  बताया गया..
कि वी आर लीडर इन देट..पायनियर इन देट..
रेवेन्यू इतना बिलियन..एक्सिस्ट इन 20 कंट्रीज..
लेकिन मै जनता था अपनी हकीकत- इन हैंड 8000 पर मंथ है..
मै समझने लगा हूँ  कि मै उस लड़ाई को अब तक लड़ता आया हूँ  जो मेरे लिए थी ही नहीं..
पर यहां से लौट पाना अब मुश्किल है..
कई बार बेवजह की लड़ाइयों में हम इतने उलझ जाते हैं कि खुद को भूल जाते हैं..
और अब मेरे  साथ भी वही होगा जो कैब में बैठे 35 की उम्र में 55 के लगने वाले..
जोशी सर के साथ हुआ होगा..
ये कहानी हम सबकी है..ये हार हम सबकी है..
बस कोशिश रहे कि हम अपने सामने किसी और को ऐसे न हारने दें..
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