मोहनजो दारो ट्रेलर जो मैंने देखा और सोचा ---
ट्रेलर का पहला दृश्य हमें इतिहास की किताब का पहला अध्याय याद दिलाता है. इसमें सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान मिली बस्ती का ग्राफिक्स है, वैसा ही जैसा हम किताबों में देखते आए हैं. किताबों में पढ़ा हुआ फ़िल्मी परदे पर देखना रोमांच पैदा करता है लेकिन बस इसी दृश्य तक. इसके बाद ट्रेलर एक भव्य लेकिन नीरस फिल्म की आशंका जगाने लगता है.झलकियों से मिली कहानी कुछ इस तरह है कि ऋतिक रोशन नील की खेती करने वाले किसान (सरमन) की भूमिका निभा रहे हैं. यह किसान किसी और शहर/गांव से मोहनजो दारो व्यापार करने पहुंचता है. यहां पर उसे शहर से जुड़ाव का आभास होता है. यह आभास कहानी में एक रहस्य की संभावना तो जगाता है लेकिन सिर्फ इसे जानने के लिए फिल्म देखे जाने की जिज्ञासा पैदा नहीं करता. इसके साथ ही सिंधु घाटी की उस व्यवस्थित बस्ती में ऋतिक रोशन पूजा हेगड़े (चानी) से टकरा जाते हैं और दोनों के बीच प्रेम हो जाता है.
चानी के कपड़ों और उसे मिलते महत्व से लगता है वह कोई राजकुमारी या किसी नगर प्रमुख की संबंधी है. कहानी में एक खलनायक है जो इस बसे-बसाए नगर पर कब्ज़ा कर लेने की हसरत रखता है या फिर इसे उजाड़ देना चाहता है. यह भूमिका कबीर बेदी निभा रहे हैं. शहर के प्रति नायक का प्रेम और खलनायक की महत्वकांक्षा टकराती है. फिर कुछ मारधाड़ और कहानी ख़त्म! ट्रेलर से लब्बोलुआब समझें तो यह फिल्म प्राचीन समय की नई कहानी कहने के बजाय एक पुरानी और घिसी-पिटी कहानी कहने जा रही है
अगर बैकग्राउंड को छोड़ दिया जाए तो एक्शन करते हुए ऋतिक रोशन आपको कृष जैसे लग सकते हैं और अभिनय करते हुए तो वे ऋतिक रोशन ही लगते हैं. उनकी संवाद अदायगी पिछली फिल्मों से बिलकुल भी अलग नहीं है. इसमें भी सबसे बुरी बात यह है कि वे कहीं से भी भारतीय दिखाई नहीं देते. फिल्म में ऋतिक को करने के लिए बहुत कुछ हो सकता है लेकिन ट्रेलर में वे चुके हुए से लग रहे हैं.
विलेन की भूमिका में कबीर बेदी विश्वसनीय नहीं लग रहे हैं. ट्रेलर के कुछ दृश्यों में वे डर पैदा कर रहे हैं लेकिन यहां भी अभिनय से ज्यादा उनकी आवाज की भूमिका है. पूजा हेगड़े खूबसूरत दिख रही हैं मगर सिर्फ उतनी जितनी विक्टोरिया सीक्रेट की मॉडल्स लग सकती हैं. ट्रेलर में उनकी उपस्थिति फिल्म के लिए भी कोई संभावना नहीं जगाती. फिल्म में कुछ और चेहरे हैं जैसे नफीसा अली, अरुणोदय सिंह, किशोरी शहाणे. फिल्म में ये चेहरे ठीक-ठाक अभिनय करते दिख सकते हैं.
आशुतोष गोवारिकर इतिहास के ऐसे किस्से पहले भी पेश कर चुके हैं. इस बार जिस टाइम पीरियड को उन्होंने छुआ है वह ‘भारत एक खोज’ के बाद स्क्रीन पर नहीं दिखाया गया है. इस लिहाज से उनके पास अपने तरीके से फिल्म रचने की गुंजाइश ज्यादा थी हालांकि फिल्म का माहौल जोधा-अकबर की और कॉस्ट्यूम लगान की याद दिलाते हैं.
ट्रेलर से यह भी साफ होता है कि गोवारिकर ने सिंधु घाटी से जुड़े प्रचलित प्रतीकों का फिल्म में जमकर उपयोग किया है. अस्त्र-शस्त्र, भित्तिचित्र से लेकर नायिका का ताज तक सब कुछ इतिहास प्रेरित होकर बनाया गया है. इतिहास का ऐसा इस्तेमाल गोवारिकर ने अपनी पहली पीरियड फिल्म, लगान में भी किया था लेकिन यह ट्रेलर लगान जैसी काल्पनिक लेकिन रोचक और दिल को छू लेने वाली कहानी दिखाने का भरोसा नहीं जगा पाता. फिल्म की कथा काल्पनिक लगने के बजाय यह कालखंड ज्यादा काल्पनिक लगता है. यह शायद इसलिए कि कहानी तो हमने बार-बार देखी है बस वह वक्त नहीं देखा.
ट्रेलर की शुरुआत में जहां मोहनजो दारो में नगर के उद्धारक की एंट्री है वहीं आखिर में प्रलय के दृश्य हैं. ये दोनों दृश्य भ्रमित करते हैं. पहला दृश्य कहता है कि यह सभ्यता के बीच के किसी हिस्से की कहानी है. अंतिम दृश्य कहता है यह सभ्यता के अंत की कहानी है. पहला दृश्य फिल्म के निर्माण की वजह है लेकिन यह अंतिम दृश्य ट्रेलर में क्यों रखा गया है यह 12 अगस्त को फिल्म देखकर ही पता चलेगा.
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