Thursday, 20 August 2015

आधी आबादी में तो हिम्मत ही नहीं है |

हमारे नेता जी {मुलायम सिंह यादव } ने मंगलवार को एक कार्यक्रम के दौरान  कहा कि ऐसे बहुत से झूठे मामले उनकी जानकारी में हैं, जिनमें महिला से बलात्कार एक व्यक्ति करता है और शिकायत में चार-चार लोगों का नाम ले लिया जाता है। मुलायम सिंह यादव ने कहा, "ऐसा प्रैक्टिकली मुमकिन ही नहीं हैं..."

कार्यक्रम के दौरान मुलायम ने कहा, "अक्सर ऐसा होता है कि अगर एक आदमी रेप करता है, और शिकायत में चार लोगों का नाम होता है... रेप के लिए चार लोगों पर आरोप लगता है, लेकिन क्या ऐसा मुमकिन है...? यह प्रैक्टिकल नहीं है... वे शायद कहते होंगे, एक देख रहा था, दूसरा भी वहां था... अगर चार भाई होते हैं, तो चारों का नाम लिया जाता है..."

 शर्मिंदा हैं और मुलायम सिंह के बयान की कड़ी आलोचना करते हैं। इस छोटे से वाक्‍य के आने में इतना वक्‍त क्यों लग रहा है! पूरी उम्‍मीद और जिम्‍मेदारी के साथ मैं कह सकता हूं कि कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और बसपा की सुप्रीमो बहन मायावती ने भी जरूर यह खबर ( खबर पढ़ें) देखी होगी, लेकिन उसके बाद उन्‍होंने सोचा होगा कि यह तो होता ही रहता है, अच्‍छा है, सपा के खिलाफ ही माहौल बनेगा?

इन हस्तियों ने ऐसे बयानों पर आक्रामक होने और महिलाओं के प्रति संवदेनशीलता को इसलिए अनदेखा कर दिया, क्‍योंकि न जाने किस सदन में मुलायम की जरूरत पड़ जाए? इन दिनों आक्रामक होने का टैग लिए चल रहे कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने भी अब तक इस पर बात नहीं की है।

और कौन।  वामपंथी लापता हैं। बीजेपी की ओर से भी किसी को फि‍लहाल फुर्सत नहीं है। सबको राज्‍यसभा की चिंता है। सुषमा-जया-रेखा और हेमा, चुप हैं। यह कैसा समाजवाद है। कैसे नेता हैं, जो अपनी ही मां और बेटियों पर ऐसी गालीनुमा टिप्‍पणी पर खामोश हैं, बस घोटालों पर हंगामा करते हैं। सोशल मीडिया पर उड़ने वाले नेताओं और वंशवाद की बेल को सेक्युलरिज्म के नाम पर ढकने वालों को कब तक हम 'इग्‍नोर' करेंगे।

क्‍या डिंपल यादव में आयशा टाकिया जितनी हिम्‍मत भी नहीं है? निश्‍चित रूप से नहीं। हमें याद होना चाहिए कि सुपरिचत अभिनेत्री आयशा ने अपने पति के पिता और सपा के ही नेता अबू आजमी के महिला विरोधी बयान की सरेआम निंदा की थी। एक महिला सांसद में अगर इतनी भी सामान्‍य चेतना नहीं है, तो और हम क्‍या अपेक्षा करेंगे।

उप्र में महिलाओं पर होने वाले अत्‍याचारों और बलात्‍कार के मामलों की जड़ में मुलायम सिंह जैसे बयानों की अहम भूमिका से किसी को इंकार नहीं होगा, क्‍योंकि उनके लाखों कार्यकर्ता नेताजी के ' मार्गदर्शन ' में ही काम करते हैं। आप समझ सकते हैं कि एक ऐसे प्रदेश में जहां सरकार का असली  'मुख्‍यमंत्री'  सरेआम जनता और कार्यकर्ताओं को बलात्‍कार जैसे विषयों पर यह ज्ञान दे रहा है। उसका समाज और खासकर दबंगों पर क्‍या असर पड़ेगा?

क्‍यों हमें ऐसे नेताओं को संसद और विधानसभाओं में भेजना चाहिए। भेजा हमने ही है, तो सोचना भी हमें ही पड़ेगा और इसके साथ ही उनके बच्‍चों और परिवार के बारे में भी। ऐसे आज्ञाकारी बच्‍चों और उनके पिता को जो मुख्‍यमंत्री जैसे संवैधानिक पदों का मजाक बनाकर गंगा में बहा रहे हैं, हम हर बार अनदेखा नहीं कर सकते हैं।

दिल्‍ली से जो सत्‍ता परि‍वर्तन की लहर उठी है, उप्र उससे बहुत दूर नहीं है। समाजवाद के चिंतकों तक यह संदेश जितनी शीघ्रता से पहुंचेगा, उतना ही इसका सामाजिक असर होगा। तब तक गली मोहल्ले या टिवटर- फेसबुक या जहां कहीं आप हैं, मुलायम सिंह की इस शर्मिंदा करने वाली टिप्‍पणी की निंदा करें और इसे बहस और संवाद का हिस्‍सा बनाएं। चीजें इग्‍नोर करने से ही तबाही का रूप लेती हैं, बहस और बात करने से नहीं।
- दयाशंकर मिश्र के साभार से

Thursday, 13 August 2015

ये आदत बहुत महंगी है

घूरना एक ऐसी क्रिया है की जब ये सामने वाले के द्वारा कि जाती है तो  व्यक्ति अपने को बहुत प्रताड़ित महसूस करता है । परन्तु जब स्वम् के द्वारा की जा रही हो तो बहुत आनन्द  आता है । याद है जब आइस क्रीम  खा रही दीदी को घूरना कितना अच्छा लगता था । बस मुह में पानी आ जाता था और मन होता  था  की थोड़ी सी गिर जाये तो हम भी चख ले लेकिन गिरना तो दूर उलटे दीदी टोंक जरूर देती थी " छोटू टुकुर टुकुर मत देख नज़र लग जायेगी " उंन्हे  अपने उप्र लगने वाली नज़र का डर नहीं था । उंन्हे  तो इस बात का डर होता की कही छोटू के घूरने से आइस क्रीम गिर न जाये और गिर गई तो ये तुरंत कौए की तरह लपक लेगा । कभी जब दीदी के साथ मेले ढेले  में जाता तो चाट की दुकानो पर चाची मामी ढेर  सारी  दीदी बहुत सारी बुआ को टिकिया चाट कहते देख मुह में पानी आ जाता लेकिन क्या कर सकते है हम तो घूर  सकते है आई मीन देख सकते है बस । कभी कभी दीदी की सहेलियां मेरे घूरने से परेशान हो कर मेरी शिकायत कर देती की मै  हमेशा घूरता रहता हूँ बस दीदी घर पहुंच कर मेरे कान ऐठ देती । माँ  की डांट  पड़ती सो अलग । एक बार तो कुछ ज्यादा ही डांट पड़ी मुझे तो रोना आ  गया  मुझे रुआंसा देख दीदी मुझे मनाने लगी मैंने बताया की मै तुम्हारी सहेलियों को नहीं घूरता मै तो बस चाट को ही देखता हूँ । इतना सुनना  था की दीदी हंसी और बोली छोटू सब जानतें  है की तू उंन्हे  नहीं चाट पकोड़े मिठाई को घूरता है लेकिन ये बुरा लगता है लोग समझेगें की देखो छोटू को कभी खाने को ही नहीं मिला, तू अभी छोटा है ना । खैर इसी लपट परेड  में कब पढाई पुरी  कर  कृषि बिभाग में लिपिक हो गया पता ही नहीं चला । इस बीच मेरी घूरने की आदत नहीं गई । हाँ दीदी कभी कभी कहती थी की तेरी ये  आदत एक दिन बहुत महंगी पड़ेगी । क्यू की अब तू बड़ा हो गया है । बड़ा हो गया इसका क्या मतलब मैंने  पूछा वो मुस्कुराई और बोली जब तू छोटा था तब की बात और थी लोग समझते थे की चाट को ही घूर रहा है अब तू बड़ा है ना  अब लोग सोचेगें की तू चाट और आइस क्रीम को नहीं उसको खाने वाली को घूर रहा है । खैर मैंने इस बात पर गौर किया और सावधानी बरती । अरे सावधानी का मतलब ये नहीं की मै  अब चोर नजरो से खाने पिने वाली चीजो को देखने लगा , अब तो मै  ऐसी जगह जाने लगा जहां घूरने पर और छूट  मिले । मतलब मै  जाने लगा आइस क्रीम पार्लर , या फिर फ़ूड पार्क । बस पूछिये नहीं स्टाल और फ्रीजर में करीने से लगी सजी हुई चटपटी  चीजो को जी भर कर घुरिये । कोई नहीं रोकेगा । हा कभी कभी अटेंडेंट आ कर जरूर पूछता था की सर  क्या कुछ नया ट्राई करेंगे । कभी कभी मुफ्त में चखने को भी मिल जाता था । कसम ढक्कन वाले गुरु जी की मजा आ था । हमने तो सोच रखा था की नौकरी करेंगे तो ऐसी ही किसी जगह जैसे की पारले , कैडबरी , ब्रिटानिया , नस्ले आदि आदि । अब इन कम्पनियों  में नौकरी चाहिए तो कृषि में स्नातक, या फिर रसायन कृषि में स्नातक , या फिर फूड इंडस्ट्री से रिलेटेड कोई कोर्श । हमने भी किया बायो केमिट्री  में स्नातक अप्लाई भी किया  सलेक्सशन  भी हुआ लेकिन तभी पिता जी चिल्लाये क्या चाकलेट टाफी की कम्पनी  में काम करोगे । खाद बनाने वाली कंपनी में जगह निकल रही है फार्म भरो तैयारी करो और बन जाओ बाबू । मरता क्या न करता । फार्म लेने गया तो पता चला बाप जान पाहिले ही ले आये है हम पहुंचे पापा जी लाइए फारम भर दे तो ज्यात हुआ फारम भर दिया गया है हम खिसियाए अब आप सब जमा भी कर दो । बाप जान घूरे वो भी हो गया है अब तुम तैयारी  करो बस । परीक्षा का दिन आया । देकर आये कसम से पहली बार में ही क्लियर हो गया । इंटरव्यू में सलेक्शन भी हो गया । रिजल्ट देख कर मै  सर पकड़ कर बैठ गया की गोया  लोग क्यू कहते है की बड़ी तैयारी  करनी पड़ती है सलेक्शन के लिए । लेकिन घुरण परम्परा मैंने बंद नहीं की । दीदी की शादी हो चुकी थी मै  अब मामा  बन गया था । एक दिन खबर मिली की दीदी की ननद की शादी है जाने की जरा भी इच्छा नहीं थी क्यू की अपने शहर में भारतीय व्यंजनो  पर मेला लगा था जीभ  लपलपा रही थी की वज्रपात हो गया । चलो शादी में । शायद इसी को कहते है बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना । शादी मै  पहुंचे बारात आई मेरा तो मन था की जल्दी से वहां  पहुचु जहां स्टाल लगा है लेकिन घराती  था इस लिए अपनी बारी  का इंतजार किये जा रहा था और स्टाल पर बढ़ती भीड़ को घूर रहा था डर  था कहीं  सब खत्म न हो जाये अरे खाना नहीं यार रसगुल्ले आइस क्रीम मिठाई इमरती डेजर्ट सब खाए जा रहे थे हमें कोई पूछ नहीं रहा था हम बस अपने भांजे को गोंद    में लिए बैठे थे और स्टालों को घूरे जा रहे थे ।  तभी हमारी दीदी आई और बोली चिंता मत कर तेरे लिए बचा कर रखा है और भांजे को उठा कर साथ में आई एक सुकुमारी को पकड़ा दिया  । मै सकपका गया लेकिन उनसे क्या छुपा था हाँ   बात है उन्होंने एक बात है जो ये थी की उन्होंने फिर कहा तेरी आदत महंगी  पड़ने वाली है 
उस समय तो ध्यान नहीं दिया । लेकिन जब एक महीने बाद मेरी शादी को लेकर माँ अचानक बोली सुन छोटू अब मुझसे घर का काम नहीं होता तेरे लिए बहुरिया पसंद कर दी है उन्होंने ये बात ऐसे कही जैसे मै  8 - 10  सालो से शादी के लिए मना  कर रहा हूँ 
कसम से जब लड़की की फोटो देखि तो पता चला की दीदी ने ये क्यू कहाँ था की तेरी घूरने की आदत महगी पड़ने वाली है ये वही सुकुमारी है जिसे हमारी दीदी ने भांजे को हमारी गोंद  से उठा कर पकड़ाया था । 
तो आज जब हमारी शादी होने जा रही है सब कह रहे है चाट पकोड़े बंद आइस क्रीम बंद मिठाई  बंद चटर पटर बंद और मै  सिर्फ ये कहना चाहता हु सब से की कृपा करके इतनी बड़ी सजा ना  दे ये तो बहुत महगीं है 



मुन्नी की घर यात्रा

अभी कुछ दिन पाहिले ही हमारे अशोक भैया ने बजरंगी भाई जान देख ली | शाम को चौपाल पर पर बैढते ही कल्लन से बोले अरे ढक्कन एक चाय ला तो और हा पैसे छुट्टन के खाते में लिख लेना बेचारा छुट्टन खिसिया कर रह गया अब क्या करे अशोक भैया से सीना जोरी भी तो नहीं कर सकता | कहाँ वो सिंगल पसली और कहाँ अशोक भैया डबल बैरल | चाय की चुस्की के साथ ही बोले की अरे तुम लोगो ने बजरंगी भाई जान देखि की नहीं बेचारा सलमानवा मुन्नी को लेकर पडोसी मूलक ले जाता है उसके घर परिवार से मिलवाने | परोपकार का काम कर रहा था लेकिन ढक्कन का तुम जानत हो अगर उसकी जगह अपने आम आदमी  केजरीवाल जाते तो अपने साथ 12 और लोगों को ले जाते, 8 कैमरामैन और 4 रिपोर्टर और जब फ़ौज उन्हें रोकती तो वो वहीं बॉर्डर पर धरना देने बैठ जाते।
लेकिन अगर मोदी जी जाते तो वो मुन्नी को अफगानिस्तान, ईरान व चीन घुमाते हुए पाकिस्तान पहुंचाते और मुन्नी वहाँ पहुँचते ही अपनी माँ से कहती - मितरों ! मैं आ गयी। अगर हमारे राहुल बाबा जाते तो मुन्नी कहती - मेरी ऊँगली पकड़ कर चलो, वरना खो जाओगे फिर ना कहना मैंने तुम्हारा ख्याल नहीं रखा | अगर रोबर्ट वाड्रा जाते तो पाकिस्तान फिर से भारत का हिस्सा बन जाता। आपको तो पता है की वो जमीनों के मामले में कितने लकी है मुन्नी को पाकिस्तान छोड़ने अगर आलोक नाथ जाते तो मुन्नी का कन्यादान करके ही लौटते। कोई कम तो है नहीं उनके पास | अगर कुमार विश्वास जाते तो वो उन्हें वापस छोड़ने के लिए एम्बुलेंस को आना पड़ता। और दर अलग रहता की कोई सुकुमारी कन्या ये ना कह दे की इनका मेरे से चक्कर था अब भाई आप तो जानते है की जहाँ ना पहुचे रवि वहां पहुचे कवि | अगर अल्ताफ राजा जाते तो बाद में अगले दिन पूरा पाकिस्तान उन्हें वापस भारत छोड़ने आता। वैसे वो आज कल गायब ही है इसी बहाने उनका हाल चाल  भी मिल जाता | अगर अर्नब गोस्वामी जाते तो आधे पाकिस्तानी बहरे व आधे पाकिस्तानी पागल हो जाते। उनकी बातें ही इतनी खतरनाक है क्या करे | अगर आशुतोष जाते तो उन्हें भारतीय दूतावास की बजाए वेस्ट-इंडीज दूतावास में ठहराया जाता। भाई वो भी तो आम आदमी की ताकत है |  अगर एन.डी.तिवारी जाते तो वहाँ भी 2-4 घर बसा के आ जाते। और जब आते तो पता चलता की एक मुन्नी छोड़ते और कितनी पिंकी , बबलू , के साथ पाकिस्तान का विकास भी पैदा कर के ही आते |और अंत में भाईया अगर गलती से भी हमरे अपने  इमरान हाश्मी जाते तो मुन्नी को छोड़ आते और बदले में हीना रब्बानी को ले आते। 
बस लग गया ठहाका समझे ढक्कन | 

जैसी प्रभु की इच्छा ढक्कन

गाव की पगडंडी से गुजरती हुई सड़क के किनारे हमारे ढक्कन गुरु मतलब अशोक भैया अपने चेलों के साथ एक बोर्ड लगाकर बैठे हुए थे, जिस पर लिखा था, महान ज्योतिष सम्राट आपको आगे आने वाले खतरे के बारे में बतायेगे । "ठहरिये... आपका अंत निकट है। इससे पहले कि बहुत देर हो जाये, रुकिए! हम आपका जीवन बचा सकते हैं।"
एक कार फर्राटा भरते हुए वहाँ से गुजरी। चेलों ने ड्राईवर को बोर्ड पढ़ने के लिए इशारा किया। ड्राईवर ने बोर्ड की तरफ देखा और गरियाता चेलों से यह कहता हुआ निकल गया, "तुम लोग इस बियाबान जंगह में भी धंधा कर रहे हो, शर्म आनी चाहिए।"

चेलों ने असहाय नज़रों से ढक्कन गुरूजी की ओर देखा।


ढक्कन गुरूजी बोले, "जैसे प्रभु की इच्छा।" 


कुछ ही पल बाद कार के ब्रेकों के चीखने की आवाज आई और एक जोरदार धमाका हुआ। 

कुछ देर बाद एक मिनी-ट्रक निकला। उसका ड्राईवर भी चेलों को दुत्कारते हुए बिना रुके आगे चला गया। कुछ ही पल बाद फिर ब्रेकों के चीखने की आवाज़ और फिर धड़ाम। 


ढक्कन गुरूजी फिर बोले, "जैसी प्रभु की इच्छा।" 
अब चेलों से रहा नहीं गया और वह बोला, "ढक्कन गुरूजी, प्रभु की इच्छा तो ठीक है पर कैसा रहे यदि हम इस बोर्ड पर सीधे-सीधे लिख दें कि 'आगे पुलिया टूटी हुई है'।"

आखिर कब तक ढक्कन

दुबई जाने वाली फ्लाइट में तीन सीटों की पंक्ति में दो पाकिस्तानी और एक भारतीय बैठे थे। भारतीय कोने वाली सीट पर था और अपने जूते उतार कर आराम से सीट पर ही चौकड़ी मार कर बैठ गया। 

तभी पहला पाकिस्तानी बोला, "भाई मुझे तो बहुत प्यास लगी है, मैं कोक पियूंगा।` 

भारतीय कोने में बैठा था तो बोला, "भाई साहब, आप बैठो, मैं लेकर आता हूँ।" और वो एयर होस्टेस से कोक लेने नंगे पावँ ही चला गया। 


दोनों पाकिस्तानी मुस्कुराए और एक ने भारतीय के जूते में थूक दिया। 

भारतीय थोड़ी ही देर में कोक लेकर आया और फिर चौकड़ी मार कर बैठ गया। अब थोड़ी देर के बाद दूसरा पाकिस्तानी भी बोला, "मुझे भी प्यास लगी है, मैं भी कोक पियूँगा।" 


भारतीय फिर उठा और थोड़ी देर के बाद कोक लेकर आ गया। इस बीच दूसरे पाकिस्तानी ने भी उसके जूते में थूक दिया। 

दुबई पहुँचने पर भारतीय ने अपने जूते जैसे ही पहने, उसको सारी बात समझ में आ गयी। यह देख दोनों पाकिस्तानी भारतीय की हसीं उड़ाने के अंदाज़ में मुस्कुराने लगे। भारतीय बहुत ही आहत स्वर में बोला, "आखिर कब तक यह दुश्मनी चलेगी? आखिर कब तक हम भुगतते रहेंगे? आखिर कब तक यह मंजर चलेगा?
आखिर कब तक... तुम जूतों में थूकते रहोगे और हम कोक में मूतते रहेंगे?"

what's your story

मैंने अंग्रेजी में लिखा है अपने राहुल भैया भी पुर्जी में लिख कर ले जाते है वो भी अंग्रेजी में । "इसका क्या मतलब हुआ " हमने बड़ी जिज्ञासा से अशोक भाई से  पूछा ।  अमे तुम भी कमाल  के ढक्कन हो, कुछ समझते नहीं बस सवाल पर सवाल । लेकिन हमने तो केवल एक ही सवाल दा गा था । चुप कर ढक्कन वे खिसियाए अरे पुर्जी मतलब नक़ल । लोग कहते थे की संसद में नक़ल नहीं हो सकती लेकिन भैया ये तो कमाल  हो गया हमारे राहुल भैया पुरे जोश के साथ पुर्जी लाते  है  नक़ल करते है अकल  लगाते  है और सफल हो जाते है । नक़ल से याद आया की भैया हमारी दादी कहती थी की नेता जी के ज़माने में जो पास नहीं हो सकता भैया वह पढाई का सपना छोड़ ही दे तो अच्छा । समझे ढक्कन ' अशोक भैया मूछो  पर तव देते हुये  बोले । हमारे अशोक भैया का तकिया कलाम  है ढक्कन । हर बात पर ढक्कन । ढक्कन  कहाँ जा रहा है , ढक्कन  यहाँ  आ ,ढक्कन  बैठ , तुम तो बड़े ढक्कन हो वगेरा वगेरा । एक दिन तो हद हो गई उनके पिता जी ने उनकी माता जी को बुलाया वो शायद सुनी नहीं । बस बाप जान ने अशोक भाई से कहा की जरा अपनी मम्मी  को बुला तो । आदत से मजबूर अशोक भैया, माता जी के पास गये  और तपाक से बोले आपको ढक्कन बुला रहा है । बस फिर क्या था पिता जी की चप्पल और उनका टकला पर चाँद निकल आया।, दिन में ही । लईकिन क्या मजाल की उनका ढक्कन  बंद हो जाये आई मीन तकिया कलाम । खैर ढक्कन मतलब अशोक भैया को आज कल राजनीती में यका  यक रूचि हो गई है । क्या अख़बार , क्या रेडिओ, क्या टीबी सब पर पैनी नज़र और मौका मिलते ही आकाशवाणी  शुरू । मोदी जी , राहुल जी, सोनिया सब पर पूरी खबर । एक दिन तो हद कर दी बोले मोदी जी कांग्रेस से घोटालो पर सारणी बनवा रहे है हमने लपकते हुए पूछा उ कैसे भैया । अमे तुम भी कमाल के ढक्कन  हो । अरे संसद में जो रशि कशी चल रही है उसी से पता चला की सारणी  बन रही है तुम हमारी बताओ हम तुम्हारी बताएंगे । लेकिन एक बात है सब कह रहे है तुम बड़े घोटालेबाज हो । लेकिन एक बात नहीं समझ आई ढक्कन  की मोदी जी तो अबही आये है एक ही साल हुए है फिर बड़े कैसे । अरे सीनियर सिटीजन का ख़िताब तो अपनी कांग्रेस के पास है । लईकिन ढक्कन  कुछ भी हो अपने राहुल बाबा नक़ल के साथ जब से अकल लगाये है तब से इज्कल टु  सफल हो रहे है ।